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सरगुजा का ऐतिहासिक दशहरा: परंपरा, राजसी ठाठ और धार्मिक अनुष्ठान

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अंबिकापुर (पंकज शुक्ला)।

सरगुजा का दशहरा ऐतिहासिक पर्वों में से एक माना जाता है, जिसकी शुरुआत रियासत काल से हुई थी। साल 1966 तक यहां राजसी ठाठ-बाठ के साथ दशहरा मनाया जाता रहा। दशहरा के इस पर्व में धार्मिक अनुष्ठान के बाद राजपरिवार के सदस्य आम जनता से मिलते थे और इस परंपरा को आज भी निभाया जा रहा है। टीएस सिंहदेव, जो सरगुजा राजपरिवार के 117वें उत्तराधिकारी हैं, इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। दशहरे के अवसर पर सभी धार्मिक रीतियों को निभाने के बाद, टीएस सिंहदेव आम जनता से मिलते हैं और दशहरे की शुभकामनाएं देते हैं।

दशहरे की ऐतिहासिक परंपराएं:

सरगुजा का दशहरा अपने धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। आजादी से पहले सरगुजा एक रियासत थी, जहां दशहरे के दिन रघुनाथ पैलेस को आम जनता के लिए खोल दिया जाता था। दूर-दूर से लोग अम्बिकापुर आते थे और दशहरे के इस भव्य समारोह में शामिल होते थे। राजपरिवार के सदस्य हाथी पर सवार होकर शहर का भ्रमण करते थे, जहां लोग उन्हें अभिवादन करते थे और दशहरे की शुभकामनाएं देते थे।

राजसी जुलूस:

सरगुजा के महाराज के साथ दशहरे के जुलूस में हाथी, घोड़े और फोर्स का भव्य प्रदर्शन होता था। साथ ही, सरगुजिहा नृत्य दल इस शाही जुलूस का हिस्सा होता था। जुलूस के दौरान बंजारी में नीलकंठ पक्षी के दर्शन किए जाते थे, फिर जून गद्दी और ब्रह्म मंदिर में पूजा अर्चना होती थी। यह जुलूस रघुनाथ पैलेस में समाप्त होता था, जहां रियासत के गवंटिया, जागीरदार और आम जनता मौजूद होते थे।

दरबार की परंपरा:

रघुनाथ पैलेस पहुंचने के बाद यहां फाटक पूजा की जाती थी और इसके बाद दरबार लगता था। इस दरबार में इलाके के प्रमुख राजा को नजराना पेश करते थे। इसके बाद महाराजा की तरफ से रियासत की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती थी। 1966 में इस शाही परंपरा का अंतिम बार आयोजन किया गया था, जिसके बाद से जुलूस निकलना बंद हो गया। अब केवल पूजन और रघुनाथ पैलेस में आम जनता से मुलाकात की परंपरा ही जारी है।

परंपरा से जुड़ी धार्मिक मान्यता:

सरगुजा का दशहरा भगवान राम की गाथा से जुड़ा हुआ है, जिसमें रावण दहन की परंपरा भी शामिल है। इस दिन राजा का दर्शन शुभ माना जाता है, और यही कारण है कि दशहरे के अवसर पर आम जनता राजा से मिलती थी। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है, जिसे आज प्रतीकात्मक रूप से निभाया जाता है।

सरगुजा का दशहरा आज भी देश के प्रमुख दशहरा समारोहों में गिना जाता है, जहां राजपरिवार और आम जनता के बीच का यह संबंध दशहरे के अवसर पर देखने को मिलता है।


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