भिलाई (रवि कुमार भास्कर)।
दुर्ग स्थित दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय से संबद्ध कामधेनु पंचगव्य अनुसंधान एवं विस्तार केंद्र, अंजोरा, में इस वर्ष भी गौमाता के गोबर और प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर भगवान गणेश की विशुद्ध मूर्तियां तैयार की जा रही हैं। यह पहल पूजा-अर्चना के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के महत्व पर विशेष जोर देती है।

क्या है इन मूर्तियों की खासियत?
इन मूर्तियों का निर्माण डॉ राकेश मिश्र की देखरेख में हो रहा है। डॉ मिश्र ने बताया कि इन प्रतिमाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये पूर्णतः पर्यावरण अनुकूलित हैं। इन्हें किसी जलाशय या घर के गमले में विसर्जित करने पर किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थों की अनुपस्थिति के कारण जलीय जीव-जंतुओं, फसलों या साग-सब्जियों पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ेगा। इतना ही नहीं, यदि कोई बच्चा प्रत्यक्ष रूप से इन मूर्तियों के संपर्क में आता है या उन्हें चाट भी लेता है, तो भी उस पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। संस्थान ने इस पर विशेष ध्यान आकर्षित किया है कि जनसामान्य भगवान की पूजा के साथ पर्यावरण की पूजा भी करें, जिससे पर्यावरण को किसी भी प्रकार का नुकसान न हो।
विश्वविद्यालय ने इस सराहनीय कार्य की प्रशंसा की है और अपने सभी कर्मचारियों को गौमय से निर्मित इन प्रतिमाओं को क्रय करने और पर्यावरण की रक्षा करने के लिए प्रोत्साहित किया है।
कहां और कब मिलेंगी ये प्रतिमाएं?
संस्थान में निर्मित ये पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाएं बाजार में उपलब्ध गणेश की मूर्तियों से किफायती दर पर उपलब्ध हैं। इन्हें कामधेनु पंचगव्य संस्थान में आकर क्रय किया जा सकता है। इसके अलावा, भिलाई नगर निगम भी इन गोबर से बनी गणेश प्रतिमाओं को जन-जन तक पहुंचाने में कामधेनु विश्वविद्यालय का सहयोग कर रहा है।
लोगों की सुविधा के लिए, नेहरू नगर भेलवा तालाब में 27 तारीख को सुबह 7:30 बजे से कामधेनु विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा बनाई गई ये मूर्तियां उपलब्ध रहेंगी, जहां से इन्हें प्राप्त किया जा सकता है।
अधिक जानकारी के लिए डॉ राकेश मिश्र से 9993907898 पर या रमेश मरावी से 9827155961 पर संपर्क किया जा सकता है।









