14 सितम्बर 2026 |
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कैलाश मानसरोवर यात्रा: लिपुलेख मार्ग पर नेपाल ने फिर अड़ाया अड़ंगा, भारत ने ऐतिहासिक सबूतों के साथ दिया दो टूक जवाब

OM Darpan

May 04, 2026 08:07 am 234 views
कैलाश मानसरोवर यात्रा: लिपुलेख मार्ग पर नेपाल ने फिर अड़ाया अड़ंगा, भारत ने ऐतिहासिक सबूतों के साथ दिया दो टूक जवाब

नई दिल्ली (ओमदर्पण न्यूज़)।

आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत और नेपाल के बीच एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा कराने की भारत की योजना पर नेपाल ने कड़ी आपत्ति व्यक्त की है। नेपाल का दावा है कि यह इलाका उसके अधिकार क्षेत्र में आता है। वहीं, भारत ने नेपाल की इस आपत्ति का करारा जवाब देते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों एवं प्रमाणों पर आधारित हैं।

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Kailash Mansarovar Yatra Lipulekh Dispute

नेपाल का दावा: हमसे नहीं लिया गया परामर्श

भारत द्वारा हाल ही में की गई घोषणा के अनुसार, कैलाश मानसरोवर यात्रा जून और अगस्त के बीच आयोजित की जाएगी। इस घोषणा के कुछ ही दिनों बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने इंटरनेट मीडिया पर एक बयान जारी किया। बयान में कहा गया है कि इस तीर्थयात्रा मार्ग को अंतिम रूप देने से पहले भारत और चीन ने नेपाल से कोई परामर्श नहीं किया।

नेपाल ने सुगौली संधि का हवाला देते हुए अपना रुख स्पष्ट किया है। नेपाल सरकार का दावा है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी 1816 की सुगौली संधि के आधार पर उसके अविभाज्य क्षेत्र हैं और वह अपने इस रुख पर पूरी तरह कायम है।

भारत का दो टूक जवाब: 1954 से यही है यात्रा का मार्ग

नेपाल के दावों को सिरे से खारिज करते हुए भारत ने अपना रुख साफ कर दिया है। भारत का कहना है कि लिपुलेख दर्रा 1954 से ही कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है। भारत ने स्पष्ट किया है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों से परे हैं, हालांकि भारत सीमा संबंधी लंबित मुद्दों सहित सभी विषयों पर नेपाल के साथ रचनात्मक बातचीत के लिए हमेशा तैयार है।

चीन को भी किया सूचित

नेपाल सरकार ने अपने बयान में बताया है कि उसने भारत और चीन दोनों के सामने नेपाली क्षेत्र (लिपुलेख) के रास्ते आयोजित होने वाली कैलाश-मानसरोवर यात्रा के संबंध में अपना स्पष्ट रुख दोहराया है। इससे पहले भी नेपाल ने भारत सरकार से इस क्षेत्र में सड़क निर्माण, विस्तार, सीमा व्यापार और तीर्थयात्रा जैसी गतिविधियां न करने का अनुरोध किया था।

गौरतलब है कि नेपाल लंबे समय से दावा करता आ रहा है कि लिपुलेख और कालापानी उसके क्षेत्र हैं, जबकि भारत ऐतिहासिक दस्तावेजों और नियंत्रण के आधार पर इन क्षेत्रों को अपना अभिन्न अंग मानता है।

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