देशभर के डॉक्टरों की चेतावनी: एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल जानलेवा, 2050 तक सालाना 1 करोड़ मौतें संभव
OM Darpan
Sep 16, 2025 06:36 am
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16 Sep 2025
मुंबई।
क्लिनिकल इंफेक्शियस डिज़ीज़ सोसायटी (सीड्स) द्वारा आयोजित 15वें वार्षिक सम्मेलन सिड्सकॉन 2025 में देशभर के डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस (एएमआर) को भारत के लिए एक गंभीर और गहराता संकट बताया। इस सम्मेलन में एकमत से कहा गया कि एंटीबायोटिक का समझदारी और सीमित प्रयोग ही इससे बचाव का सबसे बड़ा तरीका है, क्योंकि इसका गलत इस्तेमाल अब जानलेवा साबित हो रहा है।
बढ़ता एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) का संकट
सम्मेलन में मुख्य अतिथि आईसीएम्आर की डॉ. कामिनी वालिया ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारत में डॉक्टर अक्सर बिना जांच के और कम कीमत की वजह से एंटीबायोटिक लिख देते हैं। उनकी इस प्रवृत्ति से संक्रमण और भी गहरा हो जाता है। उन्होंने मेडिकल शिक्षा में संक्रमण नियंत्रण और जागरूकता को शामिल करने पर जोर दिया। सीएमसी वेल्लोर के डॉ. जॉर्ज वर्गीज़ ने भी अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत में मरीजों को कई बार जरूरत से ज्यादा और लंबे समय तक एंटीबायोटिक दी जाती है, जिससे दवाओं का असर धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। उन्होंने समझदारी से दवा के इस्तेमाल को बेहद जरूरी बताया।अस्पतालों में जागरूकता और स्वच्छता की अपील
वैज्ञानिक अध्यक्ष डॉ. राजीव सोमन ने कहा कि अस्पतालों में एएमआर पर चर्चा और जागरूकता अनिवार्य है। उन्होंने जोर दिया कि हाथ धोने जैसी साधारण आदतें भी संक्रमण रोकने में मददगार होती हैं और आम लोगों को डॉक्टर पर एंटीबायोटिक लिखने का अनावश्यक दबाव नहीं डालना चाहिए, अन्यथा गंभीर संक्रमण का इलाज असंभव हो सकता है। सीड्स के उपाध्यक्ष डॉ. सुब्रमणियन ने स्पष्ट किया कि एएमआर की समस्या केवल दवाओं या वैक्सीन से हल नहीं हो सकती, इसके लिए स्वच्छता और मेडिकल शिक्षा में सुधार सबसे अहम उपाय हैं। लीलावती हॉस्पिटल के डॉ. शैलेंद्र होडगर समेत अन्य विशेषज्ञों ने भी इन बातों पर सहमति जताई। सीएमसी वेल्लोर के डॉ. वी. बालाजी ने चेतावनी दी कि अस्पताल में भर्ती मरीजों को वहीं संक्रमण हो जाना बेहद खतरनाक और कई बार घातक साबित हो सकता है।भारत में भयावह आंकड़े और भविष्य की चुनौती
सीड्स के सचिव डॉ. वसंत नागवेकर ने बताया कि भारत में 60-70 प्रतिशत संक्रमण तीसरी पीढ़ी की दवाओं पर भी असर नहीं करते। उन्होंने कहा कि टीबी, मलेरिया, डेंगू और लेप्टोस्पायरोसिस जैसे रोगों का इलाज हर साल कठिन होता जा रहा है। डॉ. नागवेकर ने जोर दिया कि एंटीबायोटिक का प्रयोग केवल निर्धारित गाइडलाइन के अनुसार ही होना चाहिए। सभी विशेषज्ञों ने आगाह किया कि अगर एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस पर अभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो साल 2050 तक हर साल करीब 1 करोड़ लोगों की मौत इसका कारण बन सकती है। इस भयावह स्थिति का सबसे बड़ा कारण एंटीबायोटिक का जरूरत से ज्यादा और गलत तरीके से इस्तेमाल है।
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