सुप्रीम कोर्ट से हिमाचल सरकार को राहत: विधायकों के खिलाफ 45 आपराधिक मामले वापस लेने की अर्जी पर सुनवाई को मिली मंजूरी
OM Darpan
नई दिल्ली/शिमला। हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जगी है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दे दी है, जिसमें सांसदों और विधायकों के विरुद्ध दर्ज 45 आपराधिक मामलों को वापस लेने की अनुमति मांगी गई है।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई के लिए 16 मार्च 2026 की तारीख तय की है। यह मामला राज्य की राजनीति और जन प्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती
सुक्खू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के 26 अप्रैल, 2024 के आदेश को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सरकार को सभी मामलों को वापस लेने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। राज्य सरकार का तर्क है कि ये मामले राजनीति से प्रेरित थे और इन्हें वापस लिया जाना चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के बाद प्रदेश के वर्तमान और पूर्व विधायकों व सांसदों के खिलाफ दर्ज कुल 65 मामलों को वापस लेने की सिफारिश की थी। सरकार का कहना है कि इनमें से अधिकांश मामले पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान दर्ज किए गए थे। ये मुकदमे मुख्य रूप से कोविड महामारी के समय रैलियां आयोजित करने और विरोध प्रदर्शनों को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं पर लगाए गए थे।
हाईकोर्ट ने केवल 15 मामलों में दी थी छूट
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अर्जी पर सुनवाई करते हुए केवल 15 मामलों को वापस लेने की मंजूरी दी थी। कोर्ट ने यह भी noted किया कि याचिका लंबित रहने के दौरान मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के खिलाफ दर्ज पांच मामले पहले ही निपटाए जा चुके हैं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने गंभीर धाराओं वाले मामलों को वापस लेने से साफ इनकार कर दिया था। इनमें सरकारी कर्मचारी पर हमला (आईपीसी धारा 353), आपराधिक धमकी (आईपीसी धारा 506) और आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत दर्ज मामले शामिल थे। अब राज्य सरकार ने शेष 45 मामलों को वापस लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
कानूनी पेंच: अश्विनी कुमार उपाध्याय केस का संदर्भ
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 'अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ (2020)' मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला दिया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सामान्यतः दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 321 के तहत केस वापस लेने के लिए हाईकोर्ट की अनुमति जरूरी नहीं होती, लेकिन अश्विनी कुमार उपाध्याय मामले के बाद सांसदों और विधायकों (जन प्रतिनिधियों) के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने के लिए हाईकोर्ट की मंजूरी अनिवार्य हो गई है। इसी अनिवार्यता के चलते यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंचा है।
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