“सरोकार: 2050 तक 34 करोड़ होगी बुजुर्गों की आबादी, डॉ. बत्रा ने संगीत के जरिए जगाई सेवा की अलख”
मुंबई।
तेजी से बदलते भारत में जहां एक ओर युवा ऊर्जा और तकनीकी प्रगति का डंका बज रहा है, वहीं दूसरी ओर एक गंभीर सामाजिक सच्चाई भी सामने आ रही है। देश में वरिष्ठ नागरिकों की आबादी अभूतपूर्व गति से बढ़ रही है। आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में भारत में लगभग 15.6 से 16 करोड़ लोग 60 वर्ष से अधिक आयु के हैं, और अनुमान है कि 2026 से 2050 तक यह संख्या बढ़कर 34 करोड़ के पार पहुंच जाएगी।
इस बढ़ती आबादी के बीच संसाधनों की कमी एक बड़ी चुनौती है। देश में वर्तमान में केवल 18,000 संगठित वरिष्ठ नागरिक आवास सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जिनमें से अधिकांश बुनियादी ढांचे और आवश्यक देखभाल की कमी से जूझ रही हैं। भविष्य में लगभग 23 से 25 लाख सीनियर लिविंग यूनिट्स की आवश्यकता होगी, जो इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है।
सुरों के जरिए सेवा का संकल्प
जब आंकड़े और चुनौतियां चिंता पैदा कर रही हैं, तब पद्मश्री डॉ. मुकेश बत्रा ने संवेदना और संकल्प की एक नई मिसाल पेश की है। डॉ. बत्रा ने अपने बहुप्रतीक्षित वार्षिक गायन कार्यक्रम ‘यादों की बहार’ के 14वें संस्करण के माध्यम से बुजुर्गों के कल्याण के लिए एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया।
विधवाओं की सहायता के लिए सजी शाम
मुंबई के नरिमन पॉइंट स्थित वाई. बी. चव्हाण ऑडिटोरियम में आयोजित इस गरिमामयी शाम में 550 से अधिक संगीत प्रेमी और दानवीर नागरिक सम्मिलित हुए। इस संगीतमय संध्या का मुख्य उद्देश्य ‘द शेफर्ड विडोज होम’ में रह रही वृद्ध विधवाओं की सहायता करना और उनके जीवन में खुशियों के रंग भरना था। मंच पर जब भारत के स्वर्णिम युग के सदाबहार गीतों की गूँज उठी, तो श्रोता न केवल पुरानी यादों में खो गए, बल्कि सेवा और करुणा के इस संदेश से भी गहराई से जुड़े।
गरिमा के हकदार हैं बुजुर्ग
इस अवसर पर डॉ. मुकेश बत्रा ने समाज को प्रेरित करते हुए कहा, “हमारे बुजुर्ग केवल देखभाल के मोहताज नहीं हैं, बल्कि वे सम्मान, गरिमा और अपनत्व के वास्तविक हकदार हैं।” उन्होंने जोर देते हुए कहा कि समाज में करुणा की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए। हर व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार—चाहे वह समय हो, संसाधन हों या प्रतिभा—समाज के इस वर्ग के लिए योगदान देना चाहिए।







