Search
Close this search box.
Search
Close this search box.

आदिवासी समुदाय की अनोखी दिवाली परंपरा, घर तोड़कर पूर्वजों की आत्मा की शांति का अनूठा पर्व

👇खबर सुनने के लिए प्ले बटन दबाएं

omdarpanprmot-01
previous arrow
next arrow

कोरबा।

दिवाली का त्योहार, जिसे पूरे देश में खुशियों और उजाले के पर्व के रूप में मनाया जाता है, छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों में एक अनोखी परंपरा के साथ मनाया जाता है। जहां एक ओर बाकी दुनिया अपने घरों को सजाती है, रंग-बिरंगे दीयों से रोशन करती है, वहीं छत्तीसगढ़ की विशेष पिछड़ी जनजातियों में शामिल पहाड़ी कोरवा और बिरहोर समुदाय अपने घरों को तोड़कर दिवाली मनाते हैं। यह परंपरा उनके लिए विरासत में मिली एक धरोहर है, जिसे वे आज भी निभा रहे हैं।

विरासत में मिली है अनोखी परंपरा

कोरबा जिले के लेमरू क्षेत्र के गांव कोराई, देवपहरी, देवदुआरी और छाताबहार में निवास करने वाले पहाड़ी कोरवा और बिरहोर समुदाय के लोग दिवाली के दिन अपने घरों को तोड़ देते हैं। इसके बाद वे सगे संबंधियों को बुलाकर मृत्युभोज का आयोजन करते हैं, ताकि पूर्वजों की आत्मा को शांति मिल सके। यह परंपरा उनके पूर्वजों द्वारा शुरू की गई थी और आदिवासी समुदाय इसे पीढ़ी दर पीढ़ी निभाता आ रहा है।

देवदुआरी गांव के निवासी बिरहोर समुदाय के दिल राम बताते हैं कि हम गरीब आदिवासी जंगलों में ही रहते हैं। दिवाली का त्योहार हम वैसे नहीं मनाते जैसे अन्य लोग मनाते हैं। इस दिन हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु होने पर उसके घर को तोड़ देते हैं। हमारा घर मिट्टी की झोपड़ी का होता है, जिसे तोड़कर हम दूसरे स्थान पर नया घर बना लेते हैं। जिस घर में किसी परिजन की मृत्यु होती है, उस घर में हम नहीं रहते।

दिल राम बताते हैं कि जब वह छोटे थे, तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। बिना माता-पिता के किसी तरह उनका पालन-पोषण हुआ और आज वे अपने परिवार को आगे बढ़ा रहे हैं। कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, लेकिन पूर्वजों से मिली परंपरा को नहीं छोड़ा। दिल राम का कहना है, “हम चाहते हैं कि यह परंपरा आगे भी जारी रहे। जो हमें पूर्वजों से मिली है, उसे हम नहीं छोड़ना चाहते।”

आदिवासियों की समस्याएं: मूलभूत सुविधाओं का अभाव

देवदुआरी गांव के निवासी सोबिन साय बताते हैं कि बिरहोर समुदाय के लोग वनांचल क्षेत्र में निवास करते हैं। यहां बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। गांव में अंधेरा छाया रहता है और सोलर प्लेट से लाइट का इंतजाम होता है, वह भी केवल रात को थोड़ी देर के लिए। इसके बाद हम चिमनी के सहारे रात बिताते हैं।

सोबिन साय कहते हैं, “हम सभी बिरहोर आदिवासी दिवाली की इस परंपरा का पालन करते आ रहे हैं। हम गरीब किसी तरह अपना गुजारा करते हैं और हमारी जिंदगी कठिनाईयों से भरी है, लेकिन हम अपनी परंपराओं को मानते हैं और उन्हें छोड़ना नहीं चाहते। दिवाली पर मृत्यु भोज करना और घर तोड़ना लगभग सभी आदिवासी इसका पालन करते हैं।”

पुरानी परंपराओं से जुड़ाव: आधुनिकता के बीच अपनी पहचान बनाए रखना

कोरबा जिले का नाम पहाड़ी कोरवाओं से ही जुड़ा हुआ है। जिले के ऊर्जाधानी देवपहरी, देवदुआरी, कोराई, छाताबहार जैसे सैकड़ों गांव हैं, जहां विशेष पिछड़ी जनजाति के लोग निवास करते हैं। ये आदिवासी आज भी अपनी सैकड़ों वर्षों पुरानी परंपरा से जुड़े हुए हैं। हालांकि, आदिवासी आज भी बिजली, पानी, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वे अपनी पुरानी परंपराओं को छोड़ना नहीं चाहते।

मॉडर्नाइजेशन और सूचना क्रांति के इस दौर में दिवाली के दिन घर तोड़ने की यह परंपरा बेहद अनोखी और रहस्यमयी भी है। आदिवासी समुदाय सिर्फ इतना जानते हैं कि उनके पूर्वज ऐसा करते थे और जो कुछ भी उन्हें विरासत में मिला है, उसे वे किसी भी हालत में नहीं छोड़ेंगे। यही वजह है कि इन परंपराओं को आगे बढ़ाना वे अपना फर्ज और दायित्व मानते हैं।

 

omdarpanprmot-01
previous arrow
next arrow

Leave a Comment