श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का 421 वां प्रथम प्रकाश पर्व 24 अगस्त को…

प्रकाशोत्सव
स. हरदीप सिंघ राजा छाबड़ा बेमेतरा जिला अध्यक्ष
छत्तीसगढ़ सिक्ख समाज
गुरबाणी इस जग महि चानण, करमि वसे मन आए…. अर्थात गुरबाणी (गुरु–वाणी) ज्ञान का अथाह सागर है। सभी बाणीकारो ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब के उपदेशों में आचरण व कर्मों के माध्यम से सकारात्मक एवं रचनात्मक संस्कृति के निर्माण का आधार प्रदान किया। श्री गुरु ग्रंथ साहिब न केवल सिक्खो का धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि इसका संदेश संपूर्ण मानवता को संबोधित है:
नाम सिमरन (सुमिरन) व एक ईश्वर में विश्व़ास – गुरु ग्रंथ साहिब में एक शाश्वत ईश्वर और नाम सिमरन में विश्व़ास पर बल देते हुएं कर्म कांड का त्याग किया गया। बताया कि ईश्वर सृष्टि का निर्माता, पालनहार, उद्धारकर्ता, निर्भय, मुक्त एवं सर्वव्यापी हैं, फिर भी एक है।
श्रम करना और बाटकर खाना : सिक्ख पंथ में श्रम सांसारिक कार्य नहीं, बल्कि धार्मिक कार्य है। गुरुओं ने स्वयं शारीरिक श्रम को प्राथमिकता दी और शुद्धता वाला श्रम–जीवन जीने का आदर्श प्रस्तुत किया।
सेवा:– गुरमत ने ऊंच–नीच का भेद मिटाकर सेवा को नया अर्थ दिया।
गुरबाणी में लिखा है, ‘विच दुनिया सेव कमाइए, ता दरगह बैसणु पाइए।‘
नैतिक मूल्य: गुरबाणी में सामाजिक बुराइयों के निवारण हेतु नैतिक व अचार–विचार के मूल्यों का भी पाठ पढ़ाया है।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की रचना आदि ग्रंथ ( पंजाबी : आदि ग्रन्थ ), इसका पहला प्रतिपादन, पांचवें गुरु , गुरु अर्जन (1564-1606) द्वारा संकलित किया गया था। इसका संकलन 29 अगस्त 1604 को पूरा हुआ और पहली बार 1 सितंबर 1604 को अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के अंदर स्थापित किया गया
गुरु ग्रंथ साहिब में 35 महापुरुषों की वाणी है, जिनमें 6 गुरु साहिबान, 15 भक्त, 11 भट्ट और 4 सिक्ख शामिल हैं। गुरु ग्रंथ साहिब कुल 1430 अंग(पृष्ठ) है, जिसमें कई’भगतों’ की वाणी शामिल है, न कि किसी एक भगत का नाम। इन भक्तों में भगत कबीर जी, भगत रविदास जी, भगत नामदेव जी, भगत रामानंद जी, भगत फरीद जी, भगत धन्ना जी, भगत सेन जी और कई अन्य शामिल हैं।
समान अधिकारों का प्रतिनिधित्व:
मानवाधिकारों का आनंद तभी लिया जा सकता है, जब सभी को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो। अतः गुरबाणी का उल्लेख है कि स्वतंत्र व समान जीवन के बिना शांति संभव नहीं है।
पर्यावरण संरक्षक की शिक्षा : आधुनिक युग के ज्वलंत मुद्दों का समाधान भी श्री गुरु ग्रंथ साहिब के गुरबाणी के चिंतन में मिलता है। वर्तमान में ज्ञान–विज्ञान की प्रत्येक प्रणाली में धर्म या ईश्वरीय सत्ता के स्थान पर मानव स्वार्थ केंद्र बिंदु बन गया है, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुन दोहन हो रहा है। लेकिन गुरबाणी ईश्वर की ओर से प्रदत संसाधनों के इस महान उपहार को संरक्षित करते हुए इनका उपयोग करना सिखाती है।









