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बस्तर के 200 पहुंचविहीन स्कूलों में जाना जोखिम भरा, बिना लाइफ जैकेट नदी पार करते शिक्षक
जगदलपुर। “बहुत बाढ़ है सर… डर लग रहा है।” सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में शिक्षक के ये शब्द सिर्फ उनकी घबराहट नहीं, बल्कि बस्तर संभाग के दुर्गम इलाकों में कार्यरत सैकड़ों शिक्षकों की रोजमर्रा की हकीकत बयां कर रहे हैं। बस्तर संभाग के नारायणपुर, कांकेर, बीजापुर और सुकमा जिलों में करीब 200 स्कूल ऐसे हैं जो बरसात में पहुंचविहीन हो जाते हैं। इन क्षेत्रों में आवागमन और नेटवर्क की समस्या सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।
24 शिक्षक रोज पार करते हैं कोटरी
कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा विकासखंड में 24 शिक्षक प्रतिदिन उफनती कोटरी नदी को डोंगी (छोटी नाव) के सहारे पार कर स्कूल पहुंच रहे हैं। उनके सामने सिर्फ बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर शाम सुरक्षित घर लौटने की भी बड़ी चुनौती है। अबूझमाड़ से सटे छोटे बेठिया संकुल के एक दर्जन से अधिक स्कूलों में पदस्थ शिक्षक जान जोखिम में डालकर ड्यूटी कर रहे हैं। कोटरी नदी पर पुल न होने के कारण डोंगी ही एकमात्र सहारा है। तेज बहाव के बीच कई बार घंटों नाव का इंतजार करना पड़ता है। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि सुरक्षा के लिए प्रशासन की ओर से लाइफ जैकेट जैसी बुनियादी व्यवस्था भी नहीं की गई है।
हाजिरी और वेतन कटने का डर
इन मुश्किल हालात में भी शिक्षक नियमित रूप से स्कूल पहुंच रहे हैं ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो। वीडियो में एक शिक्षक कहते सुनाई दे रहे हैं, “देख लो यार, अब बताओ वीएसके में अटेंडेंस कैसे लगाएं? हमारी परेशानी भी समझो।” शिक्षकों का कहना है कि नेटवर्क न होने के कारण विद्या समीक्षा केंद्र (VSK) एप पर समय पर हाजिरी दर्ज नहीं हो पाती। इससे उन्हें हमेशा वेतन कटने का डर सताता रहता है। हालांकि, बस्तर संभाग के संयुक्त संचालक एचआर सोम ने आश्वासन दिया है कि दुर्गम क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों को ऑनलाइन उपस्थिति में छूट देने पर विचार किया जा रहा है और उनकी मांगों से उच्च अधिकारियों को अवगत कराया जाएगा।
दो बाइक और डोंगी का कठिन सफर
प्राथमिक शाला कोपिनगुंडा के सहायक शिक्षक इमरान खान ने बताया कि सभी शिक्षक छोटे बेठिया में रहते हैं। वे स्कूल पहुंचने के लिए दो घंटे पहले घर से निकलते हैं। पहले तीन-चार किलोमीटर बाइक चलाकर नदी तक पहुंचते हैं, फिर डोंगी से उफनती नदी पार करते हैं। इसके बाद दूसरी ओर फिर तीन-चार किलोमीटर पैदल चलकर कंदाड़ी पहुंचते हैं, जहां पहले से रखी दूसरी बाइक का सहारा लेना पड़ता है। वहां से दो-तीन किलोमीटर का सफर तय कर वे अपने स्कूलों तक पहुंचते हैं। मिडिल स्कूल कंदाड़ी के शिक्षक राजेश खरे और प्राथमिक शाला बांगो कोडिया की शिक्षिका श्यामा ठाकुर ने बताया कि बारिश के चार महीनों में पूरा क्षेत्र कट जाता है। शिक्षकों ने प्रशासन से लाइफ जैकेट और पुल बनने तक सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था की मांग की है।









