रायपुर।
जिन्ना को हीरो मानने वाले भारतीय मुसलमानों का एक घटिया कुतर्क है कि जिन्ना ने नेहरू, गांधी, पटेल के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई लड़ी थी जिसके बाद भारत आजाद हुआ था। लेकिन कोई यह नहीं बताता कि उसने लडाई क्या लड़ी थी? कितने जनपद या राज्य आजाद कराए थे जिन्ना ने? कोई यह भी नही बताता कि इसी जिन्ना ने नबी मोहम्मद के नक्शे कदम पर चलते हुए जंग-ए-बद्र” की तर्ज पर 17वें रमजान की तारीख 16 अगस्त 1946 के दिन डायरेक्ट एक्शन डे की सीधी कार्यवाही में हजारों हिंदुओं का नृसंशता के साथ नरसंहार कराया था। और हिंदुओं के हत्यारे वही थे जिन्होंने 85% वोट के साथ इसी वर्ष मुस्लिम लीग को अलग राष्ट्र की मांग के लिए चुना था और बाद में इसी देश में रहे गए थे। क्या उनकी वो हिंदुओं के खिलाफक्रूरतम दृष्टि बाद में बदल गई होगी? कभी भी नहीं। जिन्ना का उद्देश्य भारत की आजादी के लिए लडना था ही नहीं, वो केवल इस्लामिक स्टेट की लडाई को राजनैतिक तरीके से लड़ रहा था। मकसद उसे भी याद था। इकबाल ने उसे मरने से पहले ही इस्लामिक स्टेट का पूरा ब्लू प्रिंट सौप दिया था। इकबाल ने सबसे पहले 30 दिसंबर 1930 ईस्वी को प्रयागराज में हुए 21 वे अधिवेशन में ही इसका प्रस्ताव रख दिया था। यानी आजादी से 17 साल पहले। अब बताओ 17 साल से मुस्लिम लीग के मुसलमान कौनसे देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे?
1921 में केरल तो 1946 में बंगाल हिंदुओं की लाशों से पट गया था। बात कुछ ऐसी थी कि जैसे-जैसे द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों की शक्ति क्षीण होती जा रही थी वैसे-वैसे भारत पर उनकी पकड़ कमजोर होती जा रही थी। आजादी की लड़ाई में जितने भी क्रांतिकारी युद्ध लड़ रहे थे वो पूर्ण स्वराज की मांग कर रहे थे लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस “डोमिनियन स्टेटस” के प्रस्ताव पर खुश थे। डोमिनियन स्टेटस अर्थात जहां कुर्सी पर तो बैठे दिखाई देंगे भारतीय लोग लेकिन वो कठपुतली होंगे अंग्रेजों के ही। यह कांग्रेस और ईस्ट इंडिया कंपनी की साझा सरकार होगी जिसमें सारे नियम विधान और शासनावली अंग्रेजों की बनाई हुई होगी। जिन्ना पहले से ही अलग इस्लामी राष्ट्र की मांग कर रहा था। सर सैयद अहमद खान और मोहम्मद इकबाल के जिन्न उसपर एकसाथ सवार हो चुके थे।
10 जुलाई 1946 ई० को जवाहरलाल नेहरू ने मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें उन्होंने घोषणा कर दी कि कांग्रेस संविधान सभा में भाग लेने के लिए तैयार है। इसमें कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन योजना में सुधार का अधिकार भी अपने हाथ में ले लिया जिससे जिन्ना के भीतर के सारे जिन्न जाग उठे और उसने सीधे ही मोहनदास गांधी को धमकी दे डाली। जिन्ना ने कहा कि “अब या तो भारत का बंटवारा होगा या फिर भारत पूरी तरह तबाह और बर्बाद होगा।” 16 अगस्त को”डायरेक्ट एक्शन” लिया जाएगा। इसके बाद जिन्ना ने मुंबई में ही अपने घर पर एक मीटिंग में खुल्लम-खुल्ला डायरेक्ट एक्शन की बात को दोहराया। यहां भी यह स्पष्ट नहीं किया कि कहां, किस पर और क्या एक्शन लिया जाएगा। मोहम्मद अली जिन्ना ने 16 अगस्त का दिन ही क्यों चुना था इसके विषय में जब हमने खुलासा किया था तब अधिकांश विद्वानों को बड़ा आश्चर्य हुआ था। इस्लाम में काफिरों की गर्दन कलम करने के रूप में यह तारीख बेहद खास है। इसका इतिहास इस्लाम की नजर में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा हुआ है। इस्लाम के नबी ने व्यापारियों से बदला लेने के लिए रमजान का 17 वां दिन चुना और एक जंग लड़ी। जंग को जंग-ए-बद्र के नाम से जाना जाता है। जिन्ना ने जानबूझकर 16 अगस्त का ही दिन चुना था। लेकिन सेक्युलरिज्म में अंधी कांग्रेस को 17 वें रमजान का अ-ब-स मालूम नहीं था। आर्य समाज पहले से ही कांग्रेस को जिन्ना के सांप्रदायिक जिन्न से आगाह करता आया था लेकिन कांग्रेस उस समय डोमिनियन स्टेटस मिलने के बाद सत्ता सुख के सपनों में इतनी मग्न थी कि उसे यह सब कोरी बकवास लगी।
मुसलमानों ने जिन्ना का इशारा मिलते ही हिंदुओं के नरसंहार की तैयारी शुरू कर दी। जितने भी राशन के कोटे मुसलमानों के पास थे वहां से केरोसिन तेल का संग्रहण शुरू हुआ। हथियारों को मजहबी स्थलों पर पहुंचाया जाने लगा। हिंदुओं के खिलाफ जहरीली तकरीरें होने लगी। नरसंहार के लिए ऐसे स्थानों को चिन्हित किया गया जो
मुस्लिम बहुल थे। बयान मुंबई में दिया गया था लेकिन सुराहवर्दी ने तैयारी बंगाल में कर ली थी। अल्लाह के फजलों करम से 17वें रमजान को जुम्मे का पाक दिन भी था। सुबह-सुबह तो माहौल शांत रहा था लेकिन जैसे ही दोपहर की नमाज के बाद लोग मस्जिदों
में एकत्रित हुए हिंदुओं के खिलाफ भड़काऊ भाषण बाजी शुरू होने
लगी। लोग मस्जिदों से निकले और अपने मोहल्ले में इक्का-दुक्काहिंदुओं के घरों में घुसकर उनकी बीवी बच्चों को पीटने लगे। पुरुषों के विरोध करने पर उन पर भी हमले होने शुरू हुए। देखते-देखते यह हिंसा मुस्लिम मोहल्लों में हिंदुओं के खातमें से शुरू होकर दूसरे हिंदू मोहल्ले की ओर बढ़ने लगी। हिंदुओं को, उनके घरों को, मंदिरों व उनकी संपत्ति को केरोसिन डालकर जलाया जाने लगा। मुसलमानों द्वारा क्रमबद्ध तरीके से किए गए हमलों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह हमले केवल सुरहवर्दी की एक तकरीर या जिन्ना के एक बयान मात्र का नतीजा नहीं थी बल्कि काफी Net practice का परिणाम थी।
एक टोली पहले घर में घुसकर उत्पात मचाती, लड़कियों का बलात्कार करती, छोटे बच्चों को काटती थी। दूसरी टोली घर पर मिट्टी तेल डालती और तीसरी आग लगाती थी। इन टोलियो में नाबालिक मुस्लिम लड़के भी भरपूर मात्रा में शामिल बताए जाते हैं। उनसे जान बचाकर भागने वालों को सड़कों और गलियों में काट डाला गया। लुटी हुई हिंदू अस्मिताएं सड़कों पर मौत की भीख मांग रही थी। कुल वधुओं की मांग चिताएं मांग रही थी पर नसीब किसी को कुछ नहीं हुआ। बंगाल धू-धू कर जलता रहा। चारों ओर नारा-ए-तकबीर अल्लाह हू अकबर चिल्लाती इस्लामी जिहादी भीड़ हिंदुओं को चीरती, काटती, लूटती, जलाती आगे बढ़ रही थी। कई तात्कालिक लेखक कहते हैं कि कोलकाता में पहले कभी मस्जिदों में इतनी नमाजियों की भीड़ नहीं देखी गई थी। संभवतः काफी स्थानीय लोगों ने यह नोटिस भी किया था कि गैर बंगाली मुसलमान काफी मात्रा में जिन्ना की घोषणा के बाद सुहरावर्दी की शह पर वहां एकत्रित हो रहे थे। आज भी कही कब्जा करना हो, झगडा करना हो तो पहले ही दूर दूर से लोग बुला लिए जाते हैं और जुम्मे कि नमाज के बाद अक्सर पत्थरबाजी कि घटनाए Relatable हैं। अक्सर इंसानियत का डंडी रोना रोने वाली जमात कभी आपको यह नहीं बताती कि डायरेक्ट एक्शन डे पर कैसे गर्भवती महिलाओं का पहले बलात्कार किया गया और फिर पेट चीरकर भ्रूण तक को पैरों तले या तो रौंद दिया या फिर भालों की नोक पर उछाल दिया। उस समय सर्वाधिक दलित समाज को ही टारगेट किया गया। इसके बाद भीमराव अंबेडकर और एनी बेसेंट ने वहां का आंखों देखा वर्णन करते हुए महात्मा के खोखले भाईचारे वाले विश्वास घाती अलाप पर फटकार भी लगाई थी।
यह एकतरफा नरसंहार काफी दिनों तक चलता रहा। हिंदुओं को लाशें आंगन, सड़कों, गलियों में पड़ी सडती और सूखती रही। हिंदू मोहल्ले कई दिनों तक जलते रहे। हिंदुओं के कुएं नर मुंडो से भर चुके थे और महिलाएं या तो मार दी गई, अपहरण कर ली गई, बलात्कार करके फेंक दी गई, बेच दी गई, या फिर जबरदस्ती मौत का डर दिखा कर मुसलमान बना ली गई। उस समय उनका इस्लाम काफी मजबूत हुआ यह सब करके क्योंकि आज तक इसपर किसी को भी खेद प्रकट करते हमने नहीं देखा। क्या वो मुसलमान जिन्होंने यह सब किया था वो पाकिस्तान भाग गए थे? जी नहीं! वो यहीं इसी भारत में रह रहे हैं। लेकिन कांग्रेस को हमेशा हिंदुओं की हत्याओं के समय शुतुरमुर्ग बनने का शौक था। देखते ही देखते हजारों हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया गया था। एक सैन्य अनुमान है कि लगभग 10000 लोग मारे गए थे लेकिन यह आंकड़ा काफी कम करके दिखाया गया था।
“इंडियाज पार्टीशनः द स्टोरी ऑफ इंपिरियलिज्म इन रिट्रीट” के लेखक डी० एन० पाणिग्रही ने 1946 के हत्याकांड पर अंग्रेजी पुलिस और सेना की निष्क्रियता का जिक्र करते हुए कहा कि “उन्हें इस्लामिक भीड़ से इतना खतरा हो गया कि अगर वो बीच में आए तो वो भी मारे जाएंगे” क्योंकि तत्कालीन बंगाली मुख्यमन्त्री हुसैन शाहिद सुरहवर्दी ने उन्हें किसी की भी हत्या के लिए मुक्त हस्त व अभय करदिया था। लाशें इतनी ज्यादा थी कि उनका अंतिम संस्कार भी समय पे नहीं हो पाया। तब तक दूर-दूर से चील-गिद्ध उनको नोचने वहां पहुंच चुके थे। भ्रूण और बच्चों को कुत्ते-सियार खींच ले जाते थे। एक-एक चिता पर कई कई शवों का अंतिम संस्कार किया गया। कहते हैं जब अंतिम संस्कार करते-करते लकड़ियां समाप्त हो गई तब मिट्टी तेल डालकर लोगों को जलाना पड़ा।
यह पढ़ते समय और कलम चलाते समय मेरी आंखें भर आती हैं, वो दृश्य जब-जब मेरी आंखों के आगे जीवंत होता है। लेकिन अफसोस है कि उन्हें जंग-ए-बद्र आज तक शब्दशः याद है और हमारी युवा पीढ़ी को अपने पूर्वजों की दुर्गति भी याद नहीं है। जबकि वो हमेशा से हमेशा तक उन्हीं नर-पिशाचों के निशाने पर रहे थे और रहेंगे जब तक उनको वैचारिक शत्रु का बोध नहीं होगा।










