



रायपुर।
प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल मेकाहारा के एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट में दवा स्टोर बंद होने से मरीजों को जबरदस्त मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही और उदासीनता के कारण मरीजों की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। दवा स्टोर बंद होने से मरीजों को आंबेडकर अस्पताल के मुख्य गेट पर स्थित मिनी स्टोर से दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं। मरीजों का कहना है कि दवा स्टोर की दूरी के कारण उन्हें बार-बार चक्कर काटना पड़ता है।
मिनी स्टोर से भीड़ बढ़ने से हालात और खराब हो गए हैं। कार्डियोलॉजी और कार्डियक सर्जरी के मरीजों को विशेष रूप से भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि इस मिनी स्टोर से कई विभागों के मरीजों को दवाइयां दी जाती हैं, जिससे अत्यधिक भीड़ लगती है। मरीज अस्पताल प्रशासन की चुप्पी से हताश हैं और सवाल उठा रहे हैं कि आखिर उनकी तकलीफों का समाधान कब होगा।
मरीजों ने सुनाई अपनी व्यथा, 20 दिनों से बदतर होते हालात
मरीजों का कहना है कि इलाज और जांच तो एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट (एसीआई) में होती है, लेकिन दवा के लिए उन्हें अन्यत्र जाना पड़ता है। पिछले 15-20 दिनों से यह समस्या बढ़ती ही जा रही है। मरीजों का कहना है कि कई विभागों की दवाइयां एक ही जगह से मिलने के कारण हार्ट रोग की जरूरी दवाइयां उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।
दवाओं का टोटा, प्राइवेट मेडिकल स्टोर से खरीदने की मजबूरी
मरीजों ने बताया कि मेटोप्रोलोल 25, एस्प्रिन, डिगोक्सिन 25, और सोरबिट्रेट जैसी महत्वपूर्ण दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में मजबूरन मरीजों को ये दवाइयां प्राइवेट मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ रही हैं, जहां कीमतें अधिक होने के कारण आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है। मरीजों ने अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि उन्हें इन समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है।
पीडियाट्रिक विभाग की फार्मेसी में दो कर्मचारी कार्यरत हैं, जहां सीमित दवाइयां और मरीज हैं। यदि अस्पताल प्रबंधन चाहता तो कार्डियोलॉजी विभाग की फार्मेसी को बंद करने के बजाय वहां से एक कर्मचारी को एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट की फार्मेसी में नियुक्त कर सकता था। इससे कार्डियक मरीजों को दवाइयों के लिए बेवजह भटकना नहीं पड़ता और उनकी परेशानी कम हो सकती थी।
मरीजों की बढ़ती परेशानियों के बावजूद अस्पताल प्रबंधन की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। ऐसे में मरीज और उनके परिजन निराश और गुस्से में हैं। सवाल यह है कि क्या अस्पताल प्रशासन मरीजों की तकलीफों की अनदेखी करता रहेगा, या फिर इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम उठाएगा?





