28 सितम्बर 2026 |
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स्ट्रोक से जान तो बच गई, लेकिन आगे क्या? लाखों का रिहैब खर्च, पर बीमा कंपनियां झाड़ रहीं पल्ला!

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OM Darpan

Apr 12, 2026 08:26 am 335 views
स्ट्रोक से जान तो बच गई, लेकिन आगे क्या? लाखों का रिहैब खर्च, पर बीमा कंपनियां झाड़ रहीं पल्ला!

मुंबई।

भारत में स्ट्रोक (पक्षाघात) अब केवल एक अचानक आने वाली मेडिकल इमरजेंसी नहीं रह गया है, बल्कि यह एक लंबी और चुनौतीपूर्ण बीमारी का रूप ले चुका है। समय पर इलाज मिलने से मरीजों की जान तो बच रही है, लेकिन असली संघर्ष अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद शुरू होता है। स्ट्रोक के बाद मरीज को फिर से पैरों पर खड़ा करने और सामान्य जीवन में लौटाने के लिए लंबा और महंगा 'न्यूरो-रिहैबिलिटेशन' (Neuro-rehabilitation) बेहद जरूरी होता है। विडंबना यह है कि यह महत्वपूर्ण इलाज आज भी ज्यादातर स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) पॉलिसियों के दायरे से बाहर है, जिससे लाखों परिवार भारी आर्थिक और मानसिक दबाव में आ जाते हैं।

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हर साल 12.5 लाख नए केस

मुंबई समेत पूरे देश में स्ट्रोक के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि अब फोकस केवल मरीज की जान बचाने तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि उसे पूरी तरह से सामान्य जीवन में लौटाना भी उतना ही जरूरी है।

इंडियन फेडरेशन ऑफ न्यूरोरेहैबिलिटेशन के अध्यक्ष डॉ. निर्मल सुर्या बताते हैं, “भारत में हर साल 12.5 लाख से अधिक स्ट्रोक के नए केस सामने आते हैं। हालांकि, आधुनिक चिकित्सा के कारण मृत्यु दर में कमी आई है, लेकिन रिहैबिलिटेशन सुविधाओं की कमी मरीजों की जिंदगी को अधूरा और दूसरों पर निर्भर छोड़ देती है।”

परिवारों पर टूट रहा आर्थिक पहाड़

स्ट्रोक के मरीजों को शारीरिक और मानसिक रूप से उबारने के लिए महीनों तक फिजियोथेरेपी और विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल के न्यूरो-रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव के अनुसार, “स्ट्रोक के बाद की रिकवरी एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें लगातार थेरेपी, देखभाल और विशेषज्ञों की निगरानी जरूरी होती है। लेकिन जब यह इलाज बीमा पॉलिसियों में शामिल नहीं होता, तो इलाज का पूरा खर्च परिवारों को अपनी जेब से उठाना पड़ता है, जो उनके लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक बोझ बन जाता है।”

नई तकनीकें जगा रहीं उम्मीद, लेकिन बीमा कवरेज की है दरकार

वर्तमान में टेली-न्यूरोरेहैबिलिटेशन, रोबोटिक्स और एआई (AI) आधारित इलाज जैसी नई तकनीकें स्ट्रोक के मरीजों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी हैं। हालांकि, इनकी पहुंच और सामर्थ्य अभी भी आम आदमी के लिए सीमित है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि अगर पोस्ट-स्ट्रोक केयर और रिहैबिलिटेशन को बीमा पॉलिसियों में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए और इन सुविधाओं को सुलभ बनाया जाए, तो लाखों मरीज न सिर्फ जीवित रहेंगे, बल्कि एक सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन भी जी सकेंगे।

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