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कानून का उद्देश्य सामाजिक एकता, धार्मिक भेद नहीं: केरल हाईकोर्ट

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OM Darpan

Feb 08, 2026 01:19 am 288 views
कानून का उद्देश्य सामाजिक एकता, धार्मिक भेद नहीं: केरल हाईकोर्ट

नई दिल्ली/कोच्चि |

केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि कानून और नियमों का इस्तेमाल समाज में धार्मिक या सामुदायिक मतभेद बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सद्भाव को मजबूत करने के लिए होना चाहिए। अदालत ने यह टिप्पणी पाथनमथिट्टा स्थित अदूर श्री पार्थसारथी मंदिर में दो ईसाई पादरियों के प्रवेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए की।

क्या था मामला? पेशे से शिक्षक सानिल नारायणन नांबूथिरी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि वर्ष 2023 में श्री पार्थसारथी मंदिर में दो ईसाई पादरियों का प्रवेश 'केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश अधिकार) अधिनियम, 1965' का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड और मंदिर प्रशासन को गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने का निर्देश देने की मांग की थी।

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'अतिथि देवो भव' हमारी परंपरा

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी. और न्यायमूर्ति के.वी. जयकुमार की पीठ ने कहा कि दोनों पादरियों को श्रीकृष्ण जयंती समारोह के दौरान तांत्रिकों (पुजारियों) द्वारा अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। यह अधिकार के रूप में प्रवेश मांगने से बिल्कुल अलग मामला है। पीठ ने भारतीय परंपरा को रेखांकित करते हुए तैत्तिरीय उपनिषद के मंत्र 'मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव' का उल्लेख किया और कहा कि अतिथियों का सम्मान हमारी संस्कृति है।

नियम, मूल कानून से ऊपर नहीं हो सकता

अदालत ने कानूनी पहलू पर बात करते हुए कहा कि 1965 के मूल अधिनियम का उद्देश्य हिंदुओं के विभिन्न संप्रदायों और वर्गों के बीच भेदभाव को खत्म करना है। जबकि नियम 3(ए) में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक का प्रावधान इस अधिनियम के दायरे से परे प्रतीत होता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि अधिनियम और नियमों में कोई विरोधाभास हो, तो मूल अधिनियम ही प्रभावी माना जाएगा।

सरकार को नियम समीक्षा का सुझाव

पीठ ने राज्य सरकार को सुझाव दिया है कि वह सभी संबंधित पक्षों से चर्चा कर नियम 3(ए) की समीक्षा करे, ताकि इसे संवैधानिक मूल्यों और विधायी मंशा के अनुरूप बनाया जा सके। अदालत ने जोर देकर कहा कि बदलते दौर में कानूनों की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो समावेशिता, आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व को बढ़ावा दे।

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