नवरात्रि के पहले दिन अम्बिकापुर के महामाया मंदिर में उमड़ी भक्तों की भीड़
OM Darpan
Oct 04, 2024 07:30 am
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04 Oct 2024
अम्बिकापुर (पंकज शुक्ला)।
सरगुजा अंचल का एक प्रमुख धार्मिक स्थल, नवरात्रि के पहले दिन हजारों भक्तों से भरा हुआ दिखाई दिया। अम्बिकापुर में स्थित महामाया मंदिर, जहां देवी महामाया की धड़ की प्रतिमा स्थापित है, भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। मान्यता है कि देवी महामाया का सिर रतनपुर के महामाया मंदिर में स्थापित है।
इस मंदिर का निर्माण महाराजा रघुनाथ शरण सिंहदेव ने करवाया था, और यह स्थल विशेष रूप से चैत्र और शारदीय नवरात्रों के दौरान हजारों भक्तों की प्रार्थनाओं का केंद्र बनता है। भक्त यहां दीप जलाते हैं, झंडे लगाते हैं और माता से अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने की प्रार्थना करते हैं। अम्बिकापुर के निवासी किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत माता के चरणों में सिर झुकाकर करते हैं।
महामाया मंदिर का गर्भगृह, जहां देवी विराजमान हैं, ऊंचे चबूतरे पर स्थित है और इसके चारों ओर सीढ़ियां हैं। मंदिर में मां विंध्यवासिनी की भी मूर्ति स्थापित है। इस मंदिर की मान्यता के अनुसार मराठा यहां से मूर्ति ले जाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन वे केवल सिर ले जा पाए, जिसे बिलासपुर के पास रतनपुर में रखा गया।
अम्बिकापुर और रतनपुर दोनों स्थानों पर महामाया के दर्शन करना धार्मिक रूप से अनिवार्य माना जाता है। महामाया और समलाया के नाम से प्रसिद्ध देवी की दो मूर्तियां हैं, जिनकी पूजा अम्बिकापुर के नवागढ़ में महामाया और मोवीनपुर में समलाया के रूप में की जाती है। सरगुजा के वन क्षेत्रों में कई पुरानी मूर्तियों के बिखरे होने की बात भी बताई जाती है, जिन्हें सिंहदेव राजपरिवार ने संग्रहित किया और पूजा आरंभ की।
नवरात्रि के अवसर पर महामाया मंदिर में सरगुजा राजपरिवार के सदस्य विशेष पूजा करते हैं। मंत्री टीएस सिंहदेव मंदिर में माता की आराधना करते हैं और केवल राजपरिवार के सदस्यों को ही गर्भगृह में प्रवेश करने का अधिकार है। हर वर्ष नवरात्रि में, राजपरिवार के कुम्हारों द्वारा माता के सिर का निर्माण मिट्टी से किया जाता है।
सरगुजा में एक लोकप्रिय जस गीत है जो मां महामाया की महिमा का वर्णन करता है, जिसमें कहा गया है, "सरगुजा में धड़ है तेरा, हृदय हमने पाया, मुंड रतनपुर में मां सोहे, कैसी तेरी माया।"
मां महामाया मंदिर का निर्माण 1910 में कराया गया था, और इससे पहले यहां माता एक चबूतरे पर स्थापित थीं। राजपरिवार के लोग जब पूजा करने आते थे, तब वहां बाघ बैठा रहता था, जिसे सैनिक हटाकर मां के दर्शन कराते थे।
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