14 अक्टूबर 2026 |
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आलेख : खादी और ग्रामोद्योग: समावेशी और टिकाऊ भारत का ताना-बाना बुनना

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OM Darpan

Oct 14, 2026 02:09 pm 758 views
खादी और ग्रामोद्योग: समावेशी और टिकाऊ भारत का ताना-बाना बुनना


सुश्री रूप राशि और डॉ. नितेश धवन

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हम भारत के गौरवान्वित नागरिक हैं—जो आज नामीनल जीडीपी की दृष्टि से विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है ।  आर्थिक विकास का एक बड़ा हिस्सा एमएसएमई क्षेत्र से संचालित होता है, जिसका देश की समग्र जीडीपी में एक-तिहाई योगदान है। इसमें भी ग्रामीण सूक्ष्म उद्यमों का प्रमुख योगदान है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खादी और हथकरघा क्षेत्र जैसे कुटीर उद्योगों के साथ-साथ ग्रामीण कारीगरों द्वारा निर्मित हस्तशिल्प उत्पादों पर निर्भर करती है। ऐसे समय में, जब दुनिया असमानता, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों के क्षरण जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, वहीं आईटी और सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में एआई नौकरियों को लगातार निगलते हुए तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में, खादी और ग्रामोद्योग (केवीआई) सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को आगे बढ़ाने और आत्मनिर्भर भारत के विज़न को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ये कम संसाधनों का उपयोग करके विभिन्न कौशल स्तरों पर रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाकर स्थानीय स्तर पर पलायन को कम करने में भी सक्षम हैं। खादी—हाथ से काता और हाथ से बुना हुआ—भारत की आत्मा रही है। जिम्मेदार उत्पादन में ऊर्जा और जल का दक्षतापूर्वक उपयोग करते हुए प्राकृतिक रेशों का इस्तेमाल किया जाता है। विकास के वाहक के रूप में इसकी क्षमता को,धीमी गति से ही सही, लेकिन निरन्‍तर मान्यता मिल रही है।


हमारा उद्योग एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जो प्राचीन काल से चली आ रही है और मानव भावनाओं के व्यक्तिगत स्पर्श तथा अनुकरणीय कौशल के साथ विविध कलात्मक अभिव्यक्तियों को प्रदर्शित करती है। ऋग्वेद, रामायण, महाभारत, थालिया (यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस द्वारा रचित) और कौटिल्य से संबंधित विभिन्न लिखित ग्रंथों में न केवल कताई और बुनाई का उल्लेख मिलता है, बल्कि रेशम और कपास की उच्च गुणवत्ता का भी उल्लेख किया गया है। रामायण में कपास का उल्लेख संत के गुणों से जोड़कर किया गया है, वहीं विभिन्न प्रकार की बुनाइयां समृद्ध सांस्कृतिक ताने-बाने को दर्शाती हैं। हाथ से काते और हाथ से बुने ‘जनसमूह द्वारा उत्पादित’ खादी का उपयोग महात्मा गांधी जी ने उपनिवेशवादियों द्वारा बड़े पैमाने पर किए जाने वाले उत्पादन का मुकाबला करने के लिए किया था। स्वतंत्रता का यह वस्त्र आज अपने प्राकृतिक, आरामदायक और सतत् होने के विशिष्ट गुणों के कारण पसंदीदा फैशन स्टेटमेंट बनता जा रहा है। इसका हस्तनिर्मित स्वरूप इसे विशिष्ट पहचान प्रदान करता है और इसलिए इसे बड़े पैमाने पर होने वाले सामान्यीकृत उत्पादन के साथ मात्रा के स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की आवश्यकता नहीं है। खादी की यात्रा—स्वदेशी और स्वतंत्रता का एक प्रतीक होने से लेकर समकालीन फैशन और जीवनशैली की पसंद, विशेषकर पर्यावरण के प्रति जागरूक नई पीढ़ी की - बनने तक यह दर्शाती है कि कैसे परंपरा  स्‍वयं को बदलती उपभोक्ता प्राथमिकताओं के अनुरूप ढाल सकती है। वास्तव में, निकट-स्रोत उत्पादन की परंपरा, जो अधिक सतत् है, खादी पारिस्थितिकी तंत्र की अंतर्निहित शक्ति है। 21वीं सदी में, केवीआईसी हमारे अधिदेश में माननीय प्रधानमंत्री के आह्वान—“राष्ट्र के लिए खादी, फैशन के लिए खादी और परिवर्तन के लिए खादी”—से प्रेरणा लेते हुए कृषि, फाइबर और बाजार के बीच जुड़ाव को सुदृढ़ करने में योगदान दे रहा है।


यह ध्यान देने योग्य बात है कि हाथ से कताई, खादी और हथकरघा के बीच प्रमुख अंतरकारी विशेषता है। चूंकि सूत भी हाथ से तैयार किया जाता है, इसलिए उत्पादन की श्रम-प्रधान प्रकृति बड़ी संख्या में लोगों के लिए रोजगार के अवसर सृजित करती है। वितरित व्यवस्था के तहत तैयार किए गए हस्तनिर्मित लच्‍छों के एकत्रीकरण का कार्य करने वाली खादी संस्थाओं को पिछले सात दशकों से खादी और ग्रामोद्योग द्वारा सहायता प्रदान की जाती रही है। केवीआईसी के विभागीय और गैर-विभागीय प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से कौशल विकास और कौशल उन्नयन के ज़रिए क्षमता वृद्धि की जा रही है। देश की दो-तिहाई ग्रामीण आबादी को देखते हुए, इस क्षेत्र का विशेष महत्व है, क्योंकि यह ग्रामीण उद्यमियों के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराता है। इस प्रकार के हस्तक्षेप जमीनी स्तर पर लोगों के लिए आय सृजन के अवसर पैदा करके सीधे एसडीजी 1 (गरीबी उन्मूलन) और एसडीजी 8 (सम्मानजनक कार्य और आर्थिक विकास) को आगे बढ़ाते हैं। हाल के उपाय, जिनमें खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) द्वारा अप्रैल 2025 से कताई और बुनाई की मजदूरी में वृद्धि, कार्य उपकरणों, कार्य परिस्थितियों और उपकरण संबंधी अवसंरचना में सुधार के लिए अतिरिक्त सहायता तथा विपणन संबंधी सुविधाओं को बेहतर बनाना शामिल है, कारीगरों की आय बढ़ाने और पारंपरिक आजीविकाओं को आकर्षक तथा आर्थिक रूप से सतत् बनाने पर दिए जा रहे जोर को और अधिक प्रदर्शित करते समय के साथ, विशेष रूप से पिछले एक दशक के दौरान, खादी और ग्रामोद्योग (वीआई) पारिस्थितिकी तंत्र को लगातार सुदृढ़ किए जाने के कारण कुल उत्पादन लगभग 4,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जबकि बिक्री लगभग 8,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है।


आगे बढ़ते हुए, आरामदायक वस्त्र के रूप में पहचाना जाने वाला खादी अब नई श्रेणियों और फैशन स्‍टेटमेंट का रूप ले रहा है। इसका परिवर्तन खादी डेनिम, डिजाइनर साड़ियों और ब्राइडल वियर, आधुनिक शर्ट और ट्राउज़र्स और रेमंड तथा पीटर इंग्लैंड जैसी मुख्यधारा की ब्रांडों के संग्रहों के रूप में स्पष्ट दिखाई देता है। एमएसएमई मंत्रालय और वस्त्र मंत्रालय की संयुक्त पहल के रूप में स्थापित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर खादी (निफ्ट, दिल्ली) ने परिधानों की विभिन्न श्रेणियों, प्रिंट, बुनाई, कढ़ाई और पेंटिंग से युक्त घरेलू उत्पादों के संग्रह तथा साड़ी डिजाइनों सहित 2,129 खादी डिजाइन संग्रह विकसित किए हैं और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर खादी नॉलेज पोर्टल के माध्यम से खादी संस्थानों/इच्छुक उद्यमियों को सक्षम बनाने का कार्य जारी रखा है। शिशु परिधानों के क्षेत्र में हमारा प्रवेश इस तथ्य से प्रेरित है कि वैश्विक शिशु और बच्चों के कपड़ों का सेगमेंट बाजार के साल 2030 तक 60 अरब डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है (सीएजीआर 5–8.1 प्रतिशत के बीच), और इसमें जैविक कपास, हाइपोएलर्जेनिक कपड़ों तथा गैर-विषाक्त विनिर्माण प्रक्रियाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। 21वीं सदी के भारत के लिए ब्रांड की स्थिति को प्रतिबिंबित करने वाले नवयुग खादी डिजाइनों को प्रगति मैदान स्थित राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय एवं हस्तकला अकादमी में खादी नॉलेज पोर्टल के साथ लॉन्च किया गया। इनमें 710 नए उत्पाद शामिल हैं, जो समकालीन और नवोन्मेषी तरीके से “नए भारत की नई खादी” को प्रस्तुत करते हैं। सभी आयु वर्गों के लोगों, जेन ज़ी से लेकर दिल से युवा लोगों तक, को आकर्षित करने के लिए हाल ही में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर वेलनेस/योग वियर का संग्रह ‘स्वधा’ भी लॉन्च किया गया है।

 

खादी में रोजगार सृजन के लिए बहुत कम निवेश की आवश्यकता होती है। खादी विकास योजना, ग्रामोद्योग विकास योजना, पीएमईजीपी जैसी योजनाओं के माध्यम से सहायता प्रदान की जा रही है, जिससे केवीआई संस्थानों/इकाइयों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में सक्षम बनाया जा रहा है। सरकार वित्तीय सहायता, कार्यशील पूंजी की सुविधा, गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की सहायता, प्रशिक्षण, टूल-किट, मजदूरी क्षतिपूर्ति, विपणन सहायता, डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और सामाजिक सुरक्षा लाभों सहित सभी आवश्यक सहायता प्रदान करके पारंपरिक उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास कर रही है। अहमदाबाद स्थित ईडीआईआई द्वारा किए गए मूल्यांकन अध्ययन के अनुसार, जिसकी रिपोर्ट जनवरी 2026 में प्रस्तुत की गई, सभी योजनाओं के तहत 75 प्रतिशत से अधिक कारीगरों ने हस्तक्षेप के बाद अपनी आय में मापनीय वृद्धि बताई और उन कारीगरों के लिए वर्षभर का स्‍थायी रोजगार सृजित हुआ, जो पहले मौसमी या प्रवासी श्रम पर निर्भर थे। इससे वास्तव में श्रमिकों के पलायन को कम करने में मदद मिली। खाद्य प्रसंस्करण, अगरबत्ती और हनी मिशन के तहत प्रशिक्षित कारीगर सुगंधित तेल, सुगंधित मोमबत्तियों या मूल्यवर्धित शहद उत्पादों जैसे नए उत्पादों की श्रेणियों में विविधता लेकर आए हैं। इस विविधीकरण से स्थानीय बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति वे अधिक सुदृढ़ हुए हैं।


खादी महिला सशक्तीकरण की दिशा में सीधे योगदान देती है और इस प्रकार समावेशी विकास के उद्देश्‍य के अनुरूप है। लगभग पांच लाख खादी कारीगरों में से करीब 80 प्रतिशत महिलाएं हैं। अध्ययन के अनुसार, जीवीवाई योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी अधिक पाई गई, विशेष रूप से अगरबत्ती, हस्तनिर्मित कागज, हनी मिशन और सेवा उद्योग क्षेत्रों में। इसलिए, इस क्षेत्र में किसी भी रूप में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी ने उनके लिए सीधा पारिश्रमिक सुनिश्चित किया है, जिससे उन्हें वित्तीय स्वतंत्रता और अपने घरों के भीतर तथा बाहर बढ़े हुए आत्मसम्मान के माध्यम से सशक्त बनाया जा रहा है। महिलाओं को उत्पादक आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने में सक्षम बनाकर, खादी सीधे एसडीजी 5 (स्‍त्री-पुरुष समानता) में योगदान देती है और साथ ही एसडीजी 10 (असमानताओं में कमी) के तहत सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी सहायता करती है।


हस्तनिर्मित उद्योग की वैश्विक मांग बढ़ रही है और इसमें निर्यात की अपार संभावनाएं हैं, जिनका दोहन किया जाना आवश्यक है। पारंपरिक हस्तनिर्मित उत्पादों की विशाल मात्रा और विविधता के साथ भारत विश्व में एक अपरिहार्य स्थान रखता है। वैश्विक हथकरघा उत्पादन का 85 प्रतिशत भारत में होता है और इस ‘अंतर्निहित मूल्य’ का लाभ उठाकर ‘अधिक प्रतिफल’ प्राप्त किया जा सकता है। श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे अन्य हथकरघा देश बहुत सीमित श्रेणी के उत्पादों का निर्माण करते हैं, लेकिन ये मुख्य रूप से घरेलू उत्पादन के लिए होते हैं। भारत में अपनी जनसांख्यिकीय बढ़त और विविध सांस्कृतिक विरासत के आधार पर खादी और हथकरघा उत्पादों की वैश्विक मांग को पूरा करने की अपार क्षमता है। दुनिया भर के उपभोक्ता हस्तनिर्मित, स्रोत का पता लगाने योग्य, प्राकृतिक और पर्यावरण की दृष्टि से जिम्मेदार उत्पादों में बढ़ती रुचि दिखा रहे हैं। यह खादी और हस्तनिर्मित उत्पादों को केवल पारंपरिक वस्तुओं के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे प्रीमियम उत्पादों के रूप में पुनर्स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है, जो प्रामाणिकता, शिल्प कौशल की समृद्ध विरासत और सततता को दर्शाते हैं। विदेश मंत्रालय के अंतर्गत अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित भारत के महावाणिज्य दूतावास के ट्रेड पोर्टल पर केवीआईसी ने ईपीसी के रूप में पंजीकरण कराया है। केवीआईसी ने प्रगतिशील खादी संस्थानों को ईएक्सआईएम (एक्सिम) लाइसेंस के साथ पंजीकृत कराने की प्रक्रिया शुरू की है और अपनी क्षमताओं से परिचित कराने के लिए भारत स्थित वाणिज्य दूतावासों के साथ भी संपर्क स्थापित किया है, जिससे संपर्क सेतु बनाने में सहायता मिलेगी।


जहाँ एक ओर, खादी की अपनी पहचान है, वहीं हमारे उत्पादकों और मूल्य श्रृंखलाओं के संरक्षण के लिए अन्य देशों में ट्रेडमार्क पंजीकृत कर ब्रांड को सुरक्षित किया जा रहा है। इसके अलावा, विशिष्ट ब्रांडिंग और भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग के तहत हाल ही में खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) को पोंडुरु खादी के लिए जीआई टैग प्रदान किया गया है, जिससे विशिष्ट कपास तथा समान रूप से विशिष्ट प्रक्रिया से काते और बुने गए उत्पादों के लिए मूल्य प्राप्ति में वृद्धि होगी। इस वर्ष आगरा में आयोजित प्रथम ब्रिक्स एमएसएमई फोरम में जीआई-टैग प्राप्त पोंडुरु खादी, भारत कस्तूरी कॉटन, बंगाल मलमल और प्राकृतिक रंग वाले कपास उत्पादों सहित विशिष्ट और प्रीमियम उत्पादों को प्रदर्शित किया गया।


हमें नई पीढ़ी के जेन ज़ी ग्राहकों को आकर्षित करने, उन्हें बनाए रखने तथा ऐसे विशिष्ट उत्पादों से अधिक मूल्य प्राप्त करने के लिए अपने उत्पादों में गुणवत्ता और आश्वासन सुनिश्चित करना होगा। इसी दिशा में, विभाग के केंद्रीय स्लाइवर संयंत्र (सीएसपी), जो लगभग साढ़े तीन दशक पहले स्थापित किए गए थे, का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। वर्तमान में संचालित पांच सीएसपी में से कर्नाटक के चित्रदुर्ग और केरल के कुट्टूर स्थित संयंत्रों का आधुनिकीकरण पूरा हो चुका है और वे संचालन में हैं। कर्नाटक स्थित स्लाइवर संयंत्र अपनी 50 प्रतिशत ऊर्जा आवश्यकता के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग करता है, जबकि उत्पादन को पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल बनाने के लिए पवन ऊर्जा के उपयोग की संभावनाएं तलाश की जा रही हैं। यह दृष्टिकोण एसडीजी 9 (उद्योग, नवाचार और अवसंरचना) के अनुरूप है, क्योंकि इसके माध्यम से पारंपरिक उद्यमों को डिजाइन, प्रौद्योगिकी, आधुनिक बाजारों और विकसित होती आपूर्ति श्रृंखलाओं से जोड़ा जा रहा है। खादी संस्थानों की उत्पादन अवसंरचना के प्रौद्योगिकी उन्नयन तथा प्रौद्योगिकी-आधारित साझा सुविधा केंद्रों (सीएफसी) का प्रस्ताव ग्रामोद्योग समूहों को साझा अवसंरचना और आधुनिक प्रसंस्करण सुविधाओं के माध्यम से सुदृढ़ करने के लिए किया गया है। केवीआईसी मूल्य श्रृंखलाओं में ट्रेसेबिलिटी समाधान सक्षम कर रहा है, जिससे परंपरा के साथ आईटी के एकीकरण में सहायता मिलेगी और उत्पादन पारिस्थितिकी तंत्र की ओर नई पीढ़ी की रुचि भी आकर्षित होगी।


अंतत:, लेकिन महत्वपूर्ण रूप से, कुटीर उद्योग अपनी ऊर्जा दक्षता तथा जल दक्षता के चलते और प्राकृतिक रेशों/रंगों का उपयोग करने की वजह से प्रकृति से ही पर्यावरण के अनुकूल है। खादी एक पर्यावरण-अनुकूल वस्त्र है, जिसका कार्बन फुटप्रिंट बहुत कम है और जो पर्यावरण की दृष्टि से सतत् है। इसका मापन अग्रणी संस्थानों (आईआईटी, आईआईएम) द्वारा किया जा रहा है, जिससे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पीढ़ी के उपभोक्ताओं के लिए उत्पाद तथा ब्रांड प्रचार संबंधी संदेश में इन पहलुओं को उचित रूप से शामिल किया जा सके। हाल के समय में विश्व की अर्थव्यवस्थाओं का ध्यान अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ ऐसी पहलों की ओर केंद्रित हुआ है, जिनके माध्यम से आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों वाले विकास को भी सुनिश्चित किया जा सके। पर्यावरण संबंधी गंभीर चिंताओं, बढ़ती असमानताओं, भूख और गरीबी तथा संसाधनों के असमान वितरण के मद्देनजर भौतिक विस्तार के नैतिक पहलुओं ने नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित किया है। वर्ष 2015 में विश्व के देशों द्वारा अपनाए गए सतत् विकास के 17 लक्ष्यों वाले 2030 एजेंडा में गरीबी उन्मूलन, पर्यावरणीय संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और वितरणात्मक सामाजिक न्याय पर आधारित विकास हासिल करने के लिए कार्रवाई की दिशा रेखांकित की गई है। केवीआईसी, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-केंद्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीआईआरसीओटी) के सहयोग से प्राकृतिक रंग वाले कपास की किस्मों के विकास के उद्देश्य से पहलों की सक्रिय रूप से संभावनाएं तलाश रहा है। यह दृष्टिकोण पर्यावरण-अनुकूल पद्धतियों के अनुरूप है, क्योंकि इससे पारंपरिक रंगाई प्रक्रियाओं में होने वाले जल के उपयोग, रासायनिक प्रदूषण और ऊर्जा की खपत को कम किया जा सकता है। इसलिए, इस क्षेत्र को बढ़ावा देना उचित होगा, क्योंकि इसमें सतत् आजीविका के समाधान उपलब्ध कराने की क्षमता है। ऐसे समय में, जब फैशन उद्योग पर अपशिष्ट, प्रदूषण और अत्यधिक संसाधन खपत की समस्या से निपटने का दबाव बढ़ रहा है, खादी एक वैकल्पिक दर्शन प्रस्तुत करती है—सोच-समझकर उत्पादन करना, जिम्मेदारी से उपभोग करना और प्रत्येक उत्पाद के पीछे के कौशल को महत्व देना। वास्तव में, कोई भी ऐसा रेशा या फिलामेंट, जिसे उसकी प्रकृति (जैसे प्लास्टिक रैपर) और/या लंबाई (जैसे देसी कपास) के कारण मशीनी कताई उद्योग द्वारा सूत में परिवर्तित नहीं किया जा सकता, उसे हाथ के चरखे के माध्यम से सूत में बदला जा सकता है और इस प्रकार ‘लूप में’ तथा ‘लूप से बाहर’ रीसाइक्लिंग और अपसाइक्लिंग को सक्षम बनाया जा सकता है। इससे हाथ से कताई में रोजगार की अतिरिक्त श्रेणियों में भी योगदान किया जा सकता है। यह खादी को सीधे एसडीजी 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) और एसडीजी 13 (जलवायु कार्रवाई) से जोड़ता है। जिम्मेदार कपास की खेती सहित सतत् कृषि पद्धतियां अधिक सतत् ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देकर एसडीजी 2 (शून्य भूख) और एसडीजी 15 (भूमि पर जीवन) में इसके योगदान को और मजबूत कर सकती हैं। इन संभावनाओं के साथ, निरंतर समर्थन और प्रोत्साहन से मानव समाज के लिए जिम्मेदारीपूर्वक आपूर्ति करने वाली आपूर्ति श्रृंखलाएं और अधिक मजबूत, गहरी और व्यापक होती रहेंगी।


      व्यापक संदेश बिल्‍कुल सीधा सा है; सततता हमेशा केवल नवीनतम प्रौद्योगिकी से ही नहीं आती। कभी-कभी यह उन प्रथाओं से भी उभर सकती है, जिन्हें समुदायों ने सदियों से संरक्षित रखा है और जिन्हें आधुनिक समाज अब फिर से खोज रहा है। खादी बिल्‍कुल ऐसी ही एक संभावना का प्रतिनिधित्व करती है। यह विरासत को नवाचार के साथ, रोजगार को उद्यमिता के साथ, महिला सशक्तीकरण को सामाजिक समावेशन के साथ तथा आर्थिक गतिविधि को पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ जोड़ती है। केवीआईसी में हम उस जादू को खोजने, उसके रहस्यों को उजागर करने, उसे फिर से स्थापित और सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहे हैं, जिसे कताई-बुनाई करने वाले हमारे धागों के कलाकार पर्यावरण के प्रति जागरूक दुनिया के लिए बुन रहे हैं।


(सुश्री रूप राशि, केवीआईसी की मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं और डॉ. नितेश धवन, केवीआईसी, मुंबई के उप मुख्य  कार्यकारी अधिकारी हैं। )



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