
रायपुर।
हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर सपोर्ट जर्नलिज्म मुहिम के अंतर्गत रायपुर प्रेस क्लब, मोतीबाग में पत्रकार समागम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विशिष्ठ अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार गिरीश पंकज, शशि परगनिहा तथा सेवानिवृत्त आईएएस, कॉलमिस्ट और साहित्यकार बी.के.एस रे मौजूद रहे।
कार्यक्रम में इलेक्ट्रानिक मीडिया के रिपोर्टर, वीडियो जर्नलिस्ट्स, एंकर, प्रिंट मीडिया रिपोर्टर, फोटो जर्नलिस्ट्स और चयनित इंटरनेट पत्रकारों सहित सौ से अधिक सक्रिय मीडिया कर्मियों को शाल, श्रीफल और स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया।

सपोर्ट जर्नलिज्म मुहिम की शुरुआत: पत्रकारों के पक्ष में खड़े होने की पहल
इस मुहिम की शुरुआत 03 मई 2025 को रायपुर में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर की गई। सुधीर आज़ाद तम्बोली ने जानकारी दी कि इस अभियान के माध्यम से निर्भीक पत्रकारों को समर्थन व सहयोग दिया जाएगा और लोकतंत्र में उनकी भूमिका को सुनिश्चित करने का आव्हान किया जाएगा। उनका कहना था कि पत्रकारों पर हो रहे दमन के मामलों को देखते हुए अब एकजुटता ज़रूरी है, ताकि जो पत्रकार जनहित में खतरा उठाते हैं, उनके पीछे समाज और जनता खड़ी हो।
पत्रकारिता का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: गिरीश पंकज की प्रेरक बात
मुख्य अतिथि गिरीश पंकज ने देश में पत्रकारिता के इतिहास से लेकर वर्तमान समय की चुनौतियों पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस प्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार ‘प्रताप’ में भगत सिंह पत्रकारिता करते थे और गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के बाद भी पत्रकारिता को नहीं छोड़ा, चाहे उन्हें कितनी बार जेल जाना पड़ा हो।
प्रशासनिक सेवा के साथ लेखन साधना: बी.के.एस रे का अनुभव
विशेष अतिथि बी.के.एस रे ने बताया कि उन्होंने प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी साहित्य सृजन और पत्रकारिता से नाता नहीं तोड़ा। वे हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में लगातार सामयिक विषयों पर कॉलम लिखते रहे हैं।
पत्रकारों की एकजुटता ही समाधान: डॉ. वैभव सिंह पांडे
रायपुर प्रेस क्लब के महासचिव डॉ. वैभव सिंह पांडे ने कहा कि पत्रकारों के सामने चुनौतियां तो हैं लेकिन अगर वे संगठित रहें तो सफलता संभव है। उन्होंने संघर्षों से डरे बिना लगातार कार्य करने का संदेश दिया।
वरिष्ठ महिला पत्रकार शशि परगनिहा ने भी अन्य अतिथियों के साथ पत्रकारों को सम्मानित किया, जिससे कार्यक्रम में महिला भागीदारी का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत हुआ।
कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार पी.सी. रथ ने किया। उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उर्दू पत्रकारिता के प्रभाव की चर्चा करते हुए बताया कि “पयाम-ए-वतन” के सभी संपादकों को फांसी, गोली या तोप से उड़ा दिया गया था। साथ ही, उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दूसरे चरण में प्रताप, गणेशशंकर विद्यार्थी और लोकमान्य तिलक जैसे अखबारों की निर्णायक भूमिका पर भी प्रकाश डाला।








