(लोकेश्वर सिंह ठाकुर)
दुर्ग।
भूईं फोड़ शिवलिंग के उद्भव विकास की कहानी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही मंदिर पुनर्निर्माण की कहानी प्रेरणा परक है l आज से 300 साल पहले मालगुजारी शासन काल में घुरुवा में कुआं खोदते सामय निकले लाल भूरे रंग के नारियल के आकार के स्वयंभू भूईं फोड़ भगवान को बढ़ते, लोगों की आस्था, दर्शन हेतु श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देख तत्कालीन मालगुजार दाऊ रूपसिंह वर्मा द्वारा निर्मित छोटे मंदिर की कई बार मरम्मत के बाद भी जर्जर स्थिति को देखते लोगों की उस पर कुछ करने की इच्छा, मित्र प्रभुराम निर्मल और केज़ूराम पटेल द्वारा निर्मित जगमोहन की भी जर्जर स्थिति, प्लास्टर का उखड़ते जाना, छड़ का नीचे गिरते जाना चिंता की बात थी l अंतिम बार मरम्मत मालगुजार के वंशज दाऊ राजाराम वर्मा के समय फेरूराम लोहार द्वारा किया जाना पुष्ट होता है l मंदिर में एक जगह फेरूराम लोहार का नाम खुदा था l मंदिर पत्थर की दीवारों से बना था l प्लास्टर उखड़ने से पत्थर के सेंध में कई लोगों ने सर्प देखने की बात कही है l प्रारंभ में आदर्श क्लब और रामायण मंडली के तर्ज पर प्रभात फेरी से जन जागृति एवं धन संचय का प्रयास किया गया l इसमें उलाहने भी सुनने को मिले l मन्नू लाल साहू ढोलक बजाते थे l मैं हारमोनियम पर होता था l गले में रस्सी या गमछे से हारमोनियम और ढोलक को लटका मंजीरा, झुमका बजाते, प्रभात फेरी के गीत भजन गाते अपना क्रम जारी रखे l पर, यह नाकाफी था l इसके लिए बड़ी राशि और संगठित प्रयास की आवश्यकता थी l यह किया गया l हां, प्रभात फेरी से जो लाभ मिला, वह आगे के कार्य को सार्थक और अंजाम तक पहुंचाने में मददगार हुआ l एक तो ग्रामवासियों के मन में यह बात पक्की हो गई कि मंदिर का पुनर्निर्माण जरूरी है l भगवान के लिए उनके मन में श्रद्धा भाव, भक्ति भाव जागृत हुआ l सामूहिकता की भावना जागी l किसी बड़े कार्य को करने, अंजाम देने समूह भावना, मिलजुल कर कार्य करने की बलवती इच्छा बहुत जरूरी होती है l गांव गली मोहल्ले का वातावरण भगवन्नाम से भक्ति भाव से पूरित और पवित्र होता गया l
इसी बाबत 1995 में पूरे गांव की बैठक बुलाई गई l गांव में मुनादी की गई थी l सबने एक स्वर में मंदिर पुनर्निर्माण पर अपनी हामी भरी l सबने इसे जरूरी समझा और जल्दी काम शुरू करने की बात कही l मंदिर पुनर्निर्माण समिति का गठन किया गया l डॉ पी. के. मढ़रिया अध्यक्ष चुने गए l मुझे यानी नीलकंठ देवांगन को सचिव बनाया गया l फूलचंद धीवर कोषाध्यक्ष बने, पर, जनक यादव देखते l समिति में कई सहयोगी साथी सदस्य थे l भक्कूरम निषाद, सालिकराम साहू, तुकाराम साहू जैसे समर्पित, कर्मठ, जमीनी कार्यकर्ताओं के बदौलत चंदा उगाही का काम शुरू हुआ l साल में एक बार जब किसानों की फसल उनकी कोठी में पहुंचती, लोगों के पास पैसे होते, तब चंदा मांगने निकलते l जितना चंदा आता, उससे काम को बढ़ाते l हां, महाशिवरात्रि उत्सव के लिए फिर सहयोग मांगा जाता था l 1965 से मेला के साथ मानस सम्मेलन से शिवरात्रि उत्सव मनाया जाने लगा l पहले केवल मेला लगता था l मंदिर पुनर्निर्माण का कार्य 26 अक्टूबर 1995 को प्रारंभ हुआ l निर्माण का प्रारंभिक काम यानी पिंच तक गांव के ही मिस्त्री नारायण निर्मल ने किया l आगे के काम के लिए वास्तु शिल्पी पोखराज को बुलाया गया l वह कई मंदिरों का निर्माण कर चुका था l उसने बड़े ही मनोयोग से चतुष्कोणीय, अष्टकोणीय दीवारों पर पर सुंदर चित्रकारी नक्काशी करते मंदिर को विशाल और आकर्षक बनाया l बता दें मंदिर को बनने में पूरे दस साल लगे l इतना समय लगने का कारण था – जितना आवक, उतना काम l 2005 में काम पूरा हो सका l इस बीच बाहर के धर्म प्रेमी इस पुण्य कार्य में सहयोग दिए l समय जरूर लगा लेकिन मंदिर बड़ा, भव्य बना है l देखने वाले खुश हो जाते हैं l एक बार जो आया, बार बार आना चाहता है l पोखराज (पैरी) द्वारा निर्मित मन्दिर, उभेरे चित्रों, कलाकृतियों, मुग्धकारी कलात्मक चित्रांकन पर पेंटर इतवारी ने बहुत ही खूबसूरती से सुंदर,चित्ताकर्षक, नयनाभिराम रंग भरे हैं, चित्रकारी की है, पेंटिंग की है l देखकर मन मोहित हो जाता है l लगता है देखते ही रहें l बाह्य दीवारों पर भी नाग, घंटी, स्वास्तिक, डमरू, त्रिशूल मनमोहक बेलबूटे बने हैं जो दर्शकों को खूब भाते हैं l अंदर के दीवालों पर भी आकर्षक चित्र बने हैं l नारियल के आकार की गोलाकृति बढ़ती गई और बढ़ते बढ़ते आज दिव्य भव्य रूप धारण कर लिया है l मंदिर श्रद्धा और आस्था का केंद्र बन गया है l शिवलिंग का बढ़ना अब रुक गया है l प्रौढता आ गई है l धारियां पहले केवल निशान के रूप में दिखाई ददेती थीं l अब गहरी होती चली जा रही हैं l शायद अधिक जल पड़ने से जल में लवण होने से क्षरण हो रहा हो या और कोई कारण हो l उसे बचाने शिवलिंग के ऊपरी भाग में पीतल का तवा / ढक्कन नुमा पात्र रखते हैं l लेकिन कई भक्त उस पात्र को हटाकर जल डालते, स्पर्श करते, मलते हैं l वह शायद किसी पंडित या कथाकार द्वारा बताए विधि का पालन करते हैं कि भगवान की सेवा करो, शिवलिंग पर अपना मस्तक टिकाओ, दुर्भाग्य की रेखा मिट जाएगी, सौभाग्य की रेखा बढ़ जाएगी l पहले ऐसा नहीं करते थे l जल अर्पित करते, प्रार्थना पूजा करते थे l समिति को इस पर विचार करना चाहिए व असरकारी कोई उपाय, विकल्प ढूंढना चाहिए l

मंदिर की ख्याति इतनी बढ़ गई है कि रोज मंदिर दर्शनार्थियों, श्रद्धालुओं से अटा भरा रहता है l पर्व उत्सवों पर तो श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है l उन्हें संभालना मुश्किल होता है l क्रम से दर्शन कराने, समिति को सदस्यों की तैनाती करनी पड़ती है l सावन के महीने में खासकर सावन सोमवारी को और महाशिवरात्रि पर यही स्थिति रहती है l भारी भीड़ के मद्देनजर समिति को व्यवस्था बनानी पड़ती है l समाचार पत्रों, स्मारिकाओं, पत्रिकाओं, पुस्तकों, सोशल मीडिया में प्रचार प्रसार से इसकी ख्याति बढ़ती गई थी l कई श्रद्धालु भक्त समाचार पत्रों में प्रकाशित खबर पढ़कर यहां आकर दर्शन करना अपनी प्राथमिकता में लेते थे l दर्शन कर तृप्त प्रसन्न होते थे l कई मुझसे व्यक्तिगत मिलते भी थे और महिमायुक्त खबर प्रकाशन के लिए धन्यवाद भी देते l मंदिर की और गांव का नाम बढ़े, मेरा हमेशा यही प्रयास रहा है l इसलिए यथावसर अपना प्रयास जारी रखा l कई समूह में होते l दिव्य दर्शन और मंदिर की खूबसूरती, विशालता पर मुग्ध होते l पं. प्रदीप मिश्रा के गांव में हुए शिवपुराण कथा के बाद ख्याति और बढ़ी l दिव्य व भव्य शिवलिंग को ध्यान से देखने पर सामने की ओर ॐ अंकित दिखाई देता है l इसे उभरे कुछ ही वर्ष हुए हैं l पहले ऐसा कोई आकृति या निशान नहीं था l छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है – ‘ घुरुवा के दिन बहुरथे l ‘ यह कहावत यहां चरितार्थ है l इसका मतलब होता है कि कचरा फेंकने का खाद का गड्ढा ‘घुरुवा’ भी एक दिन सुंदर स्वरूप को प्राप्त कर लेता है l महाशिवरात्रि पर्व पर तो श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती ही है, सावन के महीने में भी श्रद्धालुओं का हुजूम देखते ही बनता है, खासकर सोमवार के दिन l विभिन्न धार्मिक सांस्कृतिक आयोजनों के साथ पांच या तीन दिन का महाशिवरात्रि उत्सव होता है l शिवरात्रि के दिन प्रातः से सायं तक दर्शनार्थी श्रद्धालुओं का दर्शन पूजन अभिषेक का क्रम चलता रहता है l इस दिन विशाल मेला लगता है l भजन कीर्तन, शिव चालीसा, शिव सहस्त्र नाम जप पाठ होता है l समूह में सत्य नारायण कथा पूजा और शिवमंच पर सत्संग, प्रस्तावित कार्यक्रम होते रहते हैं l रात्रि में मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होती हैं l सावन में कांवड़िए भी शिवजी पर जल चढ़ाने बड़ी संख्या में पहुंचते हैं l स्थानीय कांवड़िए, अहिवारा के आसपास के, रुक्खडनाथ समिति से जुड़े कांवड़िए, जेवरा सिरसा के पास के बीस बाईस गांव के कांवड़ियों का विशाल जत्था जिसमें पुरुष, महिलाएं, बच्चे बच्चियां बाजा गाजा आकर्षक झाकियों के साथ केसरिया परिधान में में पहुंचते हैं, अदभुत नजारा, दृश्य जिसे देखने गांव उमड़ पड़ता है, बेहद खास दिन होता है l भोग प्रसादी की व्यवस्था स्वयं सेवी संस्थाएं, समितियां, स्व प्रेरित होकर करती हैं l कुछ लोग स्वेच्छा से सामने आकर सेवा देते हैं l कभी इतनी झाकियां आ जाती हैं कि मंदिर के पास नहीं पहुंच पातीं l सड़क के पास के स्थानों में उन्हें झाकियों का प्रदर्शन करना पड़ता है l
पहले मंदिर छोटा था, पुनर्निर्माण कर बड़ा बनाया गया है l मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग तो अपने स्थान पर ही है l जलहरी, जल निकासी, परिक्रमा मार्ग को सुविधा के अनुसार रूप दिया गया है l अन्दर चंद्रप्रभा की आकृति में कांच जड़े हैं, जिनमें बिम्ब झलकते हैं l सुंदर दृश्य प्रतिबिंबित होता है, परिलक्षित होता है l शिवलिंग को शिव और शक्ति दोनों की सम्मिलित ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है l शिवलिंग पर चढ़े जल को अत्यंत पवित्र माना जाता है l शिवजी पर जल ऊपर से डाला जाता है जो नीचे बैठक से होते जिस मार्ग से मिलता है, उसी के चारों ओर गोलाकृति जलहरी पर चांदी का परत मढ़ा गया है l बहुत सुन्दर दिखता है l यह काम बाद में हुआ है l चांदी की परत कुछ जगह से उखड़ने लगी है l उसके लिए भी विचार करना होगा l शिवलिंग के ऊपर तांबे के बने सर्प का सिर छत्र के रूप में अवस्थित है l तांबे के एक पात्र से शिवलिंग पर निरंतर जल की बूंदें टपकती रहती हैं l उसके ऊपर चांदी के दो छत्र स्थित हैं l मान्यता एवं विश्वास है कि शिवजी के दर्शन पूजन अभिषेक से मनोकामनाएं पूरी होती हैं l शिवजी की आधी परिक्रमा की जाती है l जलहरी को पार नहीं किया जाता l
मंदिर परिसर के तीन छोटे मंदिरों में क्रमशः श्री राधा कृष्ण, शंकर पार्वती कार्तिकेय, हनुमान की दिव्य प्रतिमाएं स्थापित हैं l श्री राधा कृष्ण की मूर्ति को मंगलचंद वर्मा, डॉ नीलकंठ देवांगन, कपिलनारायण देवांगन ने, शंकर पार्वती कार्तिकेय की मूर्ति की स्थापना समन्वित सहयोग से, हनुमान की मूर्ति को दुर्ग के व्यवसायी अशोक गुप्ता ने स्थापित कराया है l पार्श्व में श्री गणेश की प्रतिमा को दुलारी वर्मा के पुत्र पोषण लाल वर्मा एवं संजीव कुमार वर्मा ने प्रतिष्ठित करवाया है l छः मूर्तियों की स्थापना प्राण प्रतिष्ठा एक साथ की गई थीं l मूर्तियां रायपुर से लाई गई थीं l नंदकठी के पुरोहित महाराज के आचार्यत्व में प्राण प्रतिष्ठा हुई थी l प्राण प्रतिष्ठा 08. 03. 2005 को हुई l और इसी के साथ मंदिर पुनर्निर्माण का कार्य पूर्ण हुआ l इसमें मुझे मुख्य यजमान होने का सौभाग्य मिला था l
आंगन में सुंदर मार्बल पत्थर बिछा है, जिसे भिलाई के ठेकादार श्री साहू ने मार्बल पत्थर और मजदूर मिस्त्री भेजकर बिछवाया है l मुख्य मंदिर में कलश स्थापना का व्यय दिनेश साहू ने वहन किया है l इसके लिए कलश धमधा से लाया गया था l धमधा में तांबे कांसे के बर्तन बनाए बेचे जाते हैं, व्यापार होता है l कलश लाने का काम भक्कूरम निषाद ने किया था l
मंदिर के बाजू में एक कोने पर बहुत पहले विक्रम संवत 2044 ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को कन्हैया उजियार ने राममंदिर बनवाया था जिसमें श्री राम, सीता, हनुमान की मूर्ति थी l बाकी हिस्सा खाली था l उस पूरे हिस्से पर छत ढालकर बड़ा हाल बनाया गया है l हाल में पांच छोटे मंदिरों में क्रमशः श्री लक्ष्मी नारायण, मां सरस्वती, राम सीता हनुमान, नरसिंहनाथ, श्री जगन्नाथ (सुभद्रा, बलभद्र सहित) की सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं, जिन्हें काशीराम वर्मा, बलराम साहू, टीकाराम तारकेश्वर वर्मा, फूलचंद धीवर ने स्थापित कराया है l बता दें, जब बड़े हाल में छत ढाला गया तो परिवार की अनुमति से कन्हैया उजियार द्वारा निर्मित मंदिर को हटाया गया l उसमें प्रतिष्ठित राम सीता हनुमान की मूर्तियां को हाल में बने पांच मंदिरों के बीच के मंदिर में विराजित किया गया l ये सभी बाद में हुए l यह कार्य 15. 04. 2016 को सम्पन्न हुआ l एक महत्व का चुनौती पूर्ण काम और हुआ l शिव मंदिर से लगे घर में पुजारी सपरिवार रहा करते थे l समिति ने उसे अधिग्रहित सुरक्षित कर पुजारी के रहने की व्यवस्था दूसरी जगह की l अब यह मंदिर की जमीन है l मंदिर के पास ही शिवमंच है जिसमें सत्संग, सांस्कृतिक व अन्य आयोजन संपन्न होते हैं l मंदिर से सटा हुआ मंच के सामने ही यह स्थान है जिससे मंचीय कार्यक्रम, सत्संग या अन्य कार्यक्रमों को बैठकर देखने में लोगों को सुविधा होती है l भोग भंडारा के लिए भी यह स्थान उपयुक्त है l यह काम मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉ नीलकंठ देवांगन के कार्यकाल में हुआ है l इसका बहुत विरोध हुआ था l एक पक्ष नहीं चाहता था कि हटाया जाए l पुरानी समिति से प्रस्ताव के बाद इस मुश्किल काम को अंजाम दिया गया l
अब बात करें जब कुआं खोदते समय निकले स्वयंभू शिवलिंग की जिसे भूईं फोड़ भगवान शिव कहा जाता है l गांव का एक कुनबा पीने के पानी की समस्या बताते मालगुजार से गुहार लगाई तो कह दिया l स्थान चयन कर कुआं खुदवा लो, खर्च मैं वहन कर लूंगा l लोगों ने खाद कचरा फेंकने का गड्ढा घुरुवा को चुनकर कुआं खोदना शुरू किया l कुछ गहराई पर एक लाल भूरे रंग का नारियल के आकार का पत्थर दिखाई दिया l उसे निकालने के कई प्रयास किए गए l लेकिन वह पत्थर हटा नहीं, टस से मस नहीं हुआ l उसे देव प्रतिमा मान पूजा पाठ, जल चढ़ाना, अगरबत्ती जलाना, नारियल चढ़ाना शुरू कर दिए l फिर कुआं बाजू में खोदा गया जो मोहल्ला वासियों के लिए एक मात्र कुआं था l मीठा पानी l उस कुएं में कई गिरे भी तो उन्हें खरोंच तक नहीं आई l अब नल, बोरिंग की सुविधा होने, उसका उपयोग नहीं होने के कारण उसे ढंक दिया गया है l अन्दर सब मर्सिबल पंप डाल दिया गया है l जरूरत पड़ने पर पानी निकाल लिया जाता है l
शिवलिंग के सामने नंदी स्थापित करने का विधान है l यहां भी शिवलिंग के ठीक सामने सफेद संगमरमर का का बना नंदी स्थापित है, जिसे हलालूराम वर्मा ने 2004 में स्थापित कराया है l शिवलिंग एक रस, एक परमतत्व, परब्रह्म का प्रतीक है तो नंदी संसार, धर्म, और परब्रह्म की उपासना का प्रतीक है l
श्रद्धालु दर्शनार्थी रोज आते हैं l मंदिर में चढ़ावा रोज चढ़ता है l पर्व विशेष पर तो बहुतायत l मंदिर को आमदनी होती है, पर समिति को अपेक्षाकृत नहीं l सावन में और महाशिवरात्रि पर तो अधिक l शिवरात्रि उत्सव के लिए चंदा वसूलते, दान की पर्चियां कटतीं, वार्षिक सदस्यता शुल्क की राशि आती l तब भी आय से अधिक व्यय होता l समिति को सोचना होगा l आय बढ़ने के विकल्प ढूंढने होंगे ताकि समिति आर्थिक दृष्टि से मजबूत रहे l उत्सव, समारोह अच्छे से कर सके, करा सके l ज्ञात हो कि मंदिर पुनर्निर्माण के लिए मंदिर के पुनर्निर्माण समिति का गठन किया गया था l कार्य पूर्ण होने पर समिति को विलोपित कर दिया गया और शिव मंदिर प्रबंधन समिति का गठन कर आगे का संचालन प्रबंधन इस समिति को सौंप दिया गया l अब यही समिति व्यवस्था, उत्सव, समारोह का आयोजन संचालन करती है l इसे इस पर विकल्प तलाश कर निर्णय लेना होगा l निर्णय लेना चाहिए l वर्तमान में रमेशबन गोस्वामी पुजारी हैं l प्रातः सायं दोनों समय आरती होती है l संध्या आरती के बाद सत्संग होता है l मंगलवार और शनिवार को सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ होता है l
शिव मंदिर जाने के लिए सड़क पर एक बड़ा कलात्मक प्रवेश द्वार बना है l संकेतक बोर्ड भी लगा है l यह शिव मंदिर गेट कहलाता है l बस स्टैंड पर है l यह ग्राम 1956 में आदर्श ग्राम एवं 1971 में आदर्श ग्राम पंचायत के रूप में गौरवान्वित हुआ है l कौड़ियों के खेल से गांव का नाम पहले कौड़िया था l कालांतर में कोड़िया हुआ l शिव मंदिर की प्रसिद्धता के कारण अब यह शिवधाम कोड़िया के नाम से जाना जाता है l यह दुर्ग – बेमेतरा मार्ग पर दुर्ग से 21 कि. मी. और धमधा से 13 कि. मी. दूरी पर स्थित है l सड़क के दोनों ओर बस्ती बसी है l शिव मंदिर आबादी क्षेत्र में है l यह शिवलिंग खास है l हजार छोटे छोटे शिवलिंग के आकार के पत्थरों से बने शिवलिंग जिसे पं. प्रदीप मिश्रा के गांव में हुए शिव महापुराण कथा के दौरान सहस्त्रेश्वर शिवलिंग कहा गया, इसकी पूजा, उपासना, आराधना, अभिषेक से कई गुणा पुण्य लाभ मिलता है l शिव भक्तों की अधिक श्रद्धा इस मंदिर के प्रति बढ़ी है l श्रद्धालुओं से मंदिर भरा रहता है l वर्तमान में मंदिर पुनर्निर्माण समिति के अध्यक्ष बेलीराम निर्मल, उपाध्यक्ष मिथलेश कुमार देवांगन, ईश्वरी पटेल, सचिव रोहित कुमार साहू, सहसचिव हितेश सेन, चंद्र विजय धीवर, कोषाध्यक्ष दिलीप निर्मल हैं l









