दुर्ग (रोहितास सिंह भुवाल)।
समीपस्थ ग्राम पथरिया (डोमा), जो दुर्ग जिले के शिवनाथ नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है, यहां का बगदई माता मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का एक प्रमुख केंद्र बन गया है। विशेषकर क्वांर और चैत्र नवरात्र पर्व के दौरान यहां आस्था का ज्योत जलाने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। वर्ष भर यहां माता बगदई के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
आवागमन की सुविधा में सुधार लाने के लिए ग्राम पथरिया के पास शिवनाथ नदी पर उच्च स्तरीय पुल निर्माण कार्य जोरों पर है। पुल का निर्माण पूर्ण होने के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में और वृद्धि होने की संभावना है। वर्तमान में बगदई माता के दर्शन के लिए समीपस्थ ग्राम अरसनारा की सरहद से 5 किलोमीटर दूर कच्चे और उबड़-खाबड़ रास्ते से एनीकट के ऊपर से पार करते हुए जाना पड़ता है, इसके बावजूद यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, बगदई माता स्थल पर आने से खोई हुई वस्तुएं वापस मिल जाती हैं। यहां के लोग मन्नत मांगने के लिए नारियल भेंट करते हैं, खासकर गुम हुई वस्तुएं, गहने, रिश्ते, या मवेशियों के खो जाने पर। यही मान्यता लोगों को बार-बार यहां खींच लाती है।
इतिहास और मान्यताएं
करीब डेढ़ सौ साल पहले यहां के गोड़ जाति के बैगा ने तीन शिलाखंडों को पहाड़ी से लाकर बरगद के पेड़ के नीचे स्थापित किया था और पूजा-अर्चना शुरू की थी। आज यह बरगद का पौधा एक विशाल वट वृक्ष बन चुका है, जिसकी लटकती लंबी जटाएं इसे एक विशिष्ट रूप देती हैं। इसे स्थानीय भाषा में “बररैय्या” कहा जाता है, जो कालांतर में “बगदई” नाम से प्रसिद्ध हो गया। “बग” का अर्थ है बरगद और “दई” का अर्थ है माता।
वर्तमान में यहां बड़ा मंदिर बनाकर तीनों शिलाखंडों को मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां काली के रूप में स्थापित किया गया है। सेवकराम निषाद ने पत्रकार आनंद साहू और साथी फोटोग्राफर बलराम साहू से चर्चा करते हुए बताया कि यहां प्रतिवर्ष दोनों नवरात्र पर्व में ज्योत जलाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। सन् 1995 में तीन ज्योतियों के साथ शुरू हुआ यह आयोजन 2018 तक बढ़कर 1060 ज्योतियों तक पहुंच गया था। हालांकि, कोरोना महामारी के कारण इसमें कमी आई।
सन् 2005 से शारदीय नवरात्र में भी ज्योत जलाने की परंपरा शुरू हुई, जिसमें 244 ज्योतियां प्रज्जवलित होती हैं। इनमें 25 अखंड ज्योतियां और 219 फुलवारी शामिल हैं। पहले ज्योत और जवांरा का विसर्जन गांव के शीतला तालाब में होता था, लेकिन श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए मंदिर परिसर में विसर्जन कुण्ड का निर्माण किया गया है।
मंदिर प्रबंधन
मंदिर का संचालन विगत 24 वर्षों से निषाद समाज द्वारा किया जा रहा है। सन् 1995 में भरत लाल निषाद, जो गांव के बेटी-दामाद थे, ने ज्योत जलाने की शुरुआत की थी। इसके बाद, सन् 2000 में मंदिर के संचालन के लिए निषाद समाज समिति का गठन किया गया, जिसमें बाबूलाल निषाद अध्यक्ष, समारू राम उपाध्यक्ष, हीरालाल कोषाध्यक्ष और आशीष पारकर सचिव के रूप में कार्यरत हैं। समिति के संरक्षक मोहन लाल और समाजसेवा लरहूराम निषाद हैं। मंदिर की देखरेख और सेवा में सेवकराम निषाद, गजानंद निषाद और शत्रुहन निषाद अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बगदई माता का यह पावन स्थल अब श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण आस्था का केंद्र बन चुका है, जहां हर साल मनोकामना ज्योत जलाने और मन्नत मांगने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।











