रायपुर (सत्यानंद सोई)।
परिवार भरोसे की नींव पर टिका होता है, लेकिन जब यही नींव दरकने लगे तो पूरा आशियाना बिखर जाता है। ऐसे ही बिखरते परिवारों को संभालने और टूटे दिलों पर मरहम लगाने का बीड़ा उठाया है छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग ने। मंगलवार को आयोग के कार्यालय में एक ऐसी ही कहानी सामने आई, जहाँ रिश्तों का धागा उलझ चुका था और उम्मीदें दम तोड़ रही थीं।
यह मार्मिक सुनवाई आयोग की अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक की अध्यक्षता में हुई, जिसमें सदस्य श्रीमती लक्ष्मी वर्मा, श्रीमती सरला कोसरिया, श्रीमती ओजस्वी मंडावी एवं दीपिका शोरी भी मौजूद थीं। इस सुनवाई में कानूनी दांव-पेंच से ज्यादा मानवीय संवेदनाओं को तरजीह दी गई।

एक छत के नीचे दो दुनिया, आयोग ने दिखाई इंसानियत की राह
जब एक पत्नी का सब्र जवाब दे गया और आँखों में आँसू लिए वह न्याय की आस में महिला आयोग की चौखट पर पहुँची, तो उसकी कहानी ने सभी को झकझोर दिया। उसने बताया कि कैसे पिछले 6 महीने से उसका पति, उसका हमसफर, उससे दूर हो गया है। कारण था पति का किसी और महिला से अवैध रिश्ता। पति उस रिश्ते को इस कदर अपना चुका था कि अपनी पत्नी को तलाक की धमकी दे रहा था, ताकि वो दूसरी महिला के साथ रह सके।
लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी था। वो ‘दूसरी महिला’ भी हालातों की मारी थी। खुद तलाकशुदा, माता-पिता द्वारा ठुकराई हुई, वह भी एक असुरक्षित जीवन जी रही थी। यहाँ आयोग ने सिर्फ कानून की किताब नहीं खोली, बल्कि इंसानियत और संवेदना का एक नया अध्याय लिखा। उन्होंने समझा कि सजा से ज्यादा सुधार की जरूरत है। आयोग ने उस दूसरी महिला को एक मौका देते हुए, और उसकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, उसे नारी निकेतन भेजने का फैसला सुनाया। उसे प्यार से समझाया गया कि किसी के बसे-बसाए घर को उजाड़ना कितना बड़ा दर्द देता है और उसे इस परिवार से दूर रहकर अपने जीवन को नई दिशा देनी चाहिए। आयोग का यह कदम एक घर बचाने और एक भटकी हुई आत्मा को राह दिखाने की एक खूबसूरत कोशिश थी।
कलेजा कंपा देने वाली माँ की कहानी, जिसे पति ने दिया धोखा
सुनवाई में एक माँ का दर्द जब जुबां पर आया तो सुनने वालों का कलेजा काँप गया। एक तरफ पति की बेरुखी, जिसने अपने जिगर के टुकड़ों को अनाथालय में छोड़ दिया, तो दूसरी तरफ इस माँ का जज्बा, जो झाड़ू-पोंछा करके भी अपने बच्चों को सीने से लगाए हुए है। बच्चे तो उसे वापस मिल गए, लेकिन पति की जिम्मेदारी से मुकरने की टीस उसकी आँखों में साफ दिख रही थी। वह अपने बच्चों के भविष्य के लिए लड़ रही थी। आयोग ने उस माँ के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि वे चाहें तो आपसी सुलह से अपने बच्चों को एक बेहतर कल दे सकते हैं।
शहर की बेटी और गांव का आंगन, आयोग ने जोड़े दिल
एक कहानी थी सपनों और हकीकत के टकराव की। शहर में पली-बढ़ी एक लड़की की शादी गांव में हुई। पति चाहता था कि वो चूल्हा-चौका और खेती-किसानी संभाले, जबकि उसने कभी ये सब देखा तक नहीं था। यह छोटा सा मनमुटाव रिश्ते में बड़ी दरार डाल रहा था। आयोग की एक छोटी सी पहल ने दो अलग-अलग दुनिया में जी रहे पति-पत्नी के बीच एक पुल बना दिया। पति को समझाया गया कि अपनी पत्नी के सपनों का भी सम्मान करे और उसे अपने साथ रखे। दोनों ने मुस्कुराकर इस फैसले को स्वीकार किया और एक नए जीवन की शुरुआत के लिए राजी हो गए।
हक़ की लड़ाई में अकेली महिला को मिला सहारा
एक महिला अपने अधिकार के लिए अकेली लड़ रही थी। कोर्ट ने उसके हक़ में 10 हजार रुपये महीने के भरण-पोषण का आदेश तो दे दिया था, पर पति एक पैसा नहीं दे रहा था। वह हर दरवाजे पर दस्तक दे चुकी थी। भले ही यह मामला कानूनी रूप से आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर था, लेकिन उन्होंने उस महिला को अँधेरे में एक रोशनी दिखाई। उसे सही कानूनी प्रक्रिया समझाई और बताया कि वह वसूली के लिए कैसे आगे बढ़ सकती है। यह सलाह उस निराश महिला के लिए उम्मीद की एक किरण की तरह थी।









