प्राकृतिक खेती से महिला किसान तुलसा ने पेश की सफलता की मिसाल
OM Darpan
रासायनिक खाद छोड़ अपनाई प्राकृतिक तकनीक, लागत में हुई 51 प्रतिशत से अधिक की बचत
कोण्डागांव।
जिले के माकड़ी विकासखंड के ग्राम छिनारी की महिला कृषक श्रीमती तुलसा महावीर ने प्राकृतिक खेती अपनाकर कृषि के क्षेत्र में सफलता की नई मिसाल पेश की है। राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन के तहत कृषि विभाग के अधिकारियों के मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण से उन्होंने यह सफलता हासिल की है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करते हुए प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाने से न केवल उनकी खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आई है, बल्कि उन्हें बेहतर आर्थिक लाभ भी प्राप्त हुआ है।
पहले 40 हजार रुपये तक आती थी लागत
श्रीमती तुलसा पहले अपनी खेती में रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों का उपयोग करती थीं। इससे खेती की लागत लगभग 40 हजार रुपये तक पहुंच जाती थी, लेकिन मेहनत के अनुरूप लाभ नहीं मिल पा रहा था। साथ ही उन्हें मिट्टी की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता होने लगी थी। इसी दौरान उन्हें राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन की जानकारी मिली, जिसके बाद उन्होंने कृषि विभाग के अमले के मार्गदर्शन में अपने खेत में धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाना शुरू किया।
इन प्राकृतिक तकनीकों से बदली तस्वीर
श्रीमती तुलसा ने बाहरी संसाधनों पर निर्भरता कम करते हुए खेत और गांव में उपलब्ध स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल किया। उन्होंने बीज उपचार के लिए बीजामृत, फसल प्रबंधन के लिए जीवामृत एवं घनजीवामृत, आच्छादन तथा प्राकृतिक कीट प्रबंधन जैसी तकनीकों का उपयोग किया। इसका सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि 40 हजार रुपये की लागत घटकर महज 19,500 रुपये रह गई। इस प्रकार उन्हें लागत में 20,500 रुपये यानी लगभग 51.25 प्रतिशत की बचत हुई।
95 हजार रुपये से अधिक का हुआ शुद्ध लाभ
कृषि विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, श्रीमती तुलसा ने 0.405 हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती कर 37 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता दर्ज की है। इससे उन्हें 1 लाख 14 हजार 700 रुपये की सकल आय हुई, जिसमें उनका शुद्ध लाभ 95,200 रुपये रहा। कम लागत में इस बेहतर आर्थिक लाभ ने उनका प्राकृतिक खेती के प्रति विश्वास और मजबूत कर दिया है।
अन्य किसानों को भी कर रहीं प्रेरित
आज श्रीमती तुलसा स्वयं इस पद्धति को अपनाने के साथ-साथ आसपास के किसानों और महिलाओं को भी प्रेरित कर रही हैं। उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती केवल एक पद्धति नहीं, बल्कि कम लागत, आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्वस्थ भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने इस सफलता व प्रोत्साहन के लिए राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन और कृषि विभाग के प्रति आभार व्यक्त किया है।
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