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बीजापुर में मिड डे मील घोटाला: सरकारी योजनाओं पर भारी विभागीय लापरवाही, बच्चों को बिना दाल-सब्जी के खाना खाने पर मजबूर

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  • चिन्नाजोजेर प्राथमिक शाला में एक साल से राशन की राशि नहीं मिली, बच्चों का पोषण आहार छिना

बीजापुर (कौशल संदुजा)।
शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली सरकार की योजनाओं की असलियत तब सामने आती है जब उनके क्रियान्वयन में लापरवाही के उदाहरण मिलते हैं। छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के चिन्नाजोजेर स्थित प्राथमिक शाला में पिछले डेढ़ साल से बच्चों को मिड डे मील में मिलने वाले पोषक आहार से वंचित रखा जा रहा है। यह सरकारी योजना बच्चों को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से चलाई गई थी, लेकिन वास्तविकता यह है कि यहां बच्चे बिना दाल-सब्जी के केवल सादा चावल खाने पर मजबूर हैं।

स्कूल के माध्याह्न भोजन संचालित करने वाले समूह को पिछले साल भर से राशन की राशि नहीं दी गई है, जिससे बच्चों को मिलने वाला पौष्टिक आहार उन तक नहीं पहुंच पा रहा है। इस लापरवाही का असर बच्चों के स्वास्थ्य और उनकी शिक्षा पर पड़ रहा है, क्योंकि बिना सही आहार के बच्चे पढ़ाई पर ठीक से ध्यान नहीं दे पा रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या केवल इस साल की नहीं है, बल्कि पिछले साल भी यही स्थिति थी। सरकारी नीतियों के बावजूद इस शाला में बच्चों को उनके अधिकार से वंचित किया जा रहा है। राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘स्कूल जतन’ के तहत बच्चों को पौष्टिक भोजन और अच्छी शिक्षा देने का वादा किया गया था, लेकिन चिन्नाजोजेर जैसे स्कूलों में यह वादा हवा-हवाई साबित हो रहा है।

स्कूल के अधिकांश बच्चे या तो घर से सब्जी लाकर स्कूल में मध्यान भोजन के साथ खाने को विवश हैं या फिर बिना सब्जी के ही सादा चावल खाकर अपना पेट भर रहे हैं। यह केवल एक स्कूल की बात नहीं है, बल्कि बीजापुर जिले के कई स्कूलों में भी इसी प्रकार की स्थिति देखने को मिल रही है। कुछ स्कूलों की हालत तो इससे भी बदतर है।

यहां सवाल उठता है कि यह नाकामी किसकी है—राज्य सरकार की, जिसने योजना बनाई, या जिला प्रशासन की, जो इसे ठीक से लागू करने में नाकाम रहा? अगर बच्चों के पोषण और शिक्षा से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों को नजरअंदाज किया जाएगा, तो देश के भविष्य को गढ़ने का सपना कैसे पूरा होगा?

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