21 सितम्बर 2026 |
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement

बिना सबूत 7 साल जेल काट ली, अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 'नैतिक संदेह पर सजा देना गलत'

शेयर करें

OM Darpan

Jan 25, 2026 09:35 am 314 views
बिना सबूत 7 साल जेल काट ली, अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 'नैतिक संदेह पर सजा देना गलत'

नई दिल्ली।

सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में निचली अदालत और उच्च न्यायालय की उस बड़ी गलती को सुधारा है, जिसके कारण करण सिंह नामक व्यक्ति को बिना किसी ठोस सबूत के 7 साल जेल की सजा काटनी पड़ी। न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304-बी (दहेज हत्या) और धारा 498-ए के तहत अपीलकर्ता करण सिंह की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है।

Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement

अदालत ने जताई गंभीर चिंता

शीर्ष अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की विस्तृत जांच के बाद पाया कि निचली अदालतों ने कानून के अनिवार्य तत्वों को लागू करने में बार-बार त्रुटियां की हैं। बेंच ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि सुप्रीम कोर्ट के बार-बार स्पष्टीकरण के बावजूद, निचली अदालतें इन प्रावधानों को 'यांत्रिक' तरीके से लागू कर रही हैं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि कानूनी प्रमाण के बजाय केवल 'नैतिक संदेह' के आधार पर सजा देना न्यायसंगत नहीं है।

यह था पूरा मामला

घटनाक्रम के अनुसार, करण सिंह का विवाह 25 जून 1996 को आशा रानी से हुआ था। विवाह के दो वर्ष के भीतर ही 2 अप्रैल 1998 को आशा रानी अपने ससुराल में मृत पाई गईं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण फांसी से दम घुटना (आत्महत्या) बताया गया था। इसके बाद करण सिंह और उनके माता-पिता पर दहेज हत्या और क्रूरता के आरोप लगाए गए।

अभियोजन पक्ष ने मुख्य रूप से मृतका की माता (शिकायतकर्ता-6), भाई (शिकायतकर्ता-7) और मामा (शिकायतकर्ता-8) के बयानों को आधार बनाया था। सत्र न्यायालय ने जहां माता-पिता को बरी कर दिया, वहीं करण सिंह को 24 जनवरी 2002 को दोषी ठहराते हुए 7 साल की सजा और 500 रुपये जुर्माने का आदेश दिया। उच्च न्यायालय ने भी 9 नवंबर 2010 को इस फैसले को बरकरार रखा था।

सुप्रीम कोर्ट में दी गई दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मृतका को मौत से ठीक पहले प्रताड़ित करने का कोई सबूत नहीं है। बचाव पक्ष ने 'चरण सिंह उर्फ चरणजीत सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य (2023)' मामले का हवाला देते हुए कहा कि केवल दहेज की मांग के आरोप दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं हैं जब तक कि मृत्यु से पूर्व क्रूरता सिद्ध न हो। सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए माना कि साक्ष्यों की गहन जांच के बिना ही निचली अदालतों ने यह फैसला सुनाया था, जिसे अब रद्द कर दिया गया है।

Tags

शेयर करें

विज्ञापन / Advertisement

Government Advertisement
260921171012912

विज्ञापन

Advertisement