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छत्तीसगढ़ पुलिस का अपराधियों को संरक्षण, निर्दोषों पर कर रही अत्याचार

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OM Darpan

Oct 24, 2024 12:25 am 255 views
छत्तीसगढ़ पुलिस का अपराधियों को संरक्षण, निर्दोषों पर कर रही अत्याचार
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  • पत्रकारों की आवाज को दबाने का पुलिसिया षड्यंत्र

  • अपराधियों को पुलिस खुला संरक्षण

     पत्रकारों पर जानलेवा हमला करने वालों को पुलिस दे रही संरक्षण

  • लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पुलिसिया दमन के निशाने पर

रायपुर (रणविजय सिंह)। छत्तीसगढ़ पुलिस, जो कानून और न्याय की रखवाली करने की जिम्मेदारी उठाती है, अब खुद ही उन मूल्यों के खिलाफ खड़ी हो गई है। हाल के दिनों में पुलिस की भूमिका अपराधियों के संरक्षण में ज्यादा दिख रही है, जबकि निर्दोष नागरिकों और पत्रकारों को डराने और मारपीट करने में पुलिस कोई कसर नहीं छोड़ रही है। रायपुर की ताज़ा घटनाएं इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, जहां पुलिस का असली चेहरा उजागर हुआ है। पत्रकारों पर हमला: पुलिस का नया काला अध्याय राजधानी रायपुर के बिलासपुर रोड पर हाल ही में हुई घटना ने यह साफ कर दिया है कि छत्तीसगढ़ पुलिस अब अपराधियों के संरक्षण का पर्याय बनती जा रही है। महिला पत्रकार निकिता राकेश जसवानी, जो अवैध गतिविधियों का पर्दाफाश करने गई थीं, पर एक संगठित हमले ने पूरे पुलिस प्रशासन की सच्चाई को बेनकाब कर दिया। जब निकिता और उनके साथी यार्ड में चल रहे अवैध लोहे के व्यापार का पर्दाफाश करने पहुंचे, तो उन पर हमला किया गया। हमलावरों ने न सिर्फ उन्हें पीटा, बल्कि उनके सबूत जुटाने के उपकरण भी छीन लिए। यह हमला उन पर नहीं, बल्कि उस सच्चाई पर था जिसे उजागर करने का साहस निकिता ने दिखाया था। पुलिस का कर्तव्य था कि अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई करे, पर इसके विपरीत निकिता को न्याय मिलने की जगह पुलिस थानों के चक्कर काटने पड़े। उन्हें कबीर नगर से आमानाका, फिर उरला थाने भटकाया गया, जहां शिकायत दर्ज करने के लिए यह शर्त रखी गई कि "पत्रकार" शब्द हटाना होगा। यह पुलिस प्रशासन के असली चेहरे को उजागर करता है—एक ऐसा चेहरा जो अपराधियों के लिए ढाल और सच्चाई की आवाजों के लिए खतरा बन गया है। भिलाई में पत्रकारों पर हमला: पुलिस की निष्क्रियता का सबसे बड़ा उदाहरण भिलाई के कचांदुर और ढौर के बीच हुई सड़क दुर्घटना की कवरेज करने गए पत्रकारों पर कबाड़ी माफिया का हमला पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता की एक और मिसाल है। तीन लोगों की मौत के बाद, जब रायपुर से एक टीवी चैनल के पत्रकार अनमोल तिवारी और उनके साथी कवरेज करने गए, तो कबाड़ी माफिया ने उन्हें बुरी तरह पीटा। हमलावरों ने पत्रकारों को रस्सियों से बांधकर जान से मारने की कोशिश की, और ये सभी पत्रकार किसी तरह भागकर अपनी जान बचा पाए। यह सवाल उठता है कि जब पुलिस प्रशासन को पत्रकारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है, तो इन हमलों को रोकने में उनकी निष्क्रियता क्यों? पुलिस ने इस मामले में कुछ आरोपियों को गिरफ्तार तो किया, लेकिन यह मात्र एक औपचारिकता थी। असली सवाल यह है कि पुलिस पहले ही ऐसे हमलों को रोकने के लिए क्यों सक्रिय नहीं होती? यह घटना पुलिस और अपराधियों के बीच बढ़ते गठजोड़ का जीता-जागता सबूत है। लोकतंत्र पर हमला: पत्रकारों की आवाज को कुचलने का पुलिसिया षड्यंत्र छत्तीसगढ़ पुलिस अब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ—स्वतंत्र प्रेस—को खत्म करने पर आमादा दिखती है। निकिता राकेश जसवानी और भिलाई में हुए हमले दोनों ही घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि छत्तीसगढ़ पुलिस अब अपराधियों के साथ मिलकर सच्चाई को दबाने की कोशिश कर रही है। अगर पुलिस प्रशासन ही पत्रकारों के खिलाफ बर्बरता करेगा, तो समाज में सत्य को उजागर करने वाले कौन होंगे? इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि छत्तीसगढ़ पुलिस अब सच्चाई की आवाजों को दबाने के षड्यंत्र में लिप्त हो चुकी है। ये घटनाएं न केवल पत्रकारों के लिए खतरा हैं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी हैं कि अगर पुलिस का यही रवैया रहा तो समाज में न्याय और स्वतंत्रता का भविष्य अंधकारमय होगा। पुलिसिया आतंक का नया चेहरा: अपराधियों का संरक्षण और जनता पर अत्याचार छत्तीसगढ़ पुलिस का यह रवैया अब सामान्य नहीं रह गया है। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि पुलिस अब केवल अपराधियों की सुरक्षा में लगी हुई है और निर्दोष नागरिकों, पत्रकारों और सच्चाई को उजागर करने वालों पर अत्याचार करने में संलिप्त हो गई है। आम जनता और खासकर पत्रकारों के खिलाफ पुलिस का यह रवैया समाज में भय और अविश्वास का माहौल पैदा कर रहा है। क्या पुलिस अब कानून की रखवाली करने के बजाय कानून के खिलाफ काम कर रही है?
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