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10 मिनट की बहस सुन चीफ जस्टिस ने दिया ऐतिहासिक फैसला
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निजी मेडिकल कॉलेजों को फटकार- आरक्षण नहीं तो कॉलेज बंद करें
नई दिल्ली/जबलपुर।
सुप्रीम कोर्ट में अदालती कार्यवाही का समय लगभग समाप्त हो चुका था। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच उठने ही वाली थी कि तभी स्क्रीन पर एक 12वीं के छात्र की तस्वीर उभरी। छात्र ने विनम्रतापूर्वक अपनी बात रखने की अनुमति मांगी। यह छात्र थे जबलपुर के नीट क्वालिफाइड अथर्व चतुर्वेदी।
चीफ जस्टिस ने छात्र के आत्मविश्वास को देखते हुए उसे सुनवाई का अवसर दिया। अथर्व ने करीब 10 मिनट तक धाराप्रवाह अपनी दलीलें पेश कीं। उसकी तैयारी और तर्कों से प्रभावित होकर पीठ ने तत्काल संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के इस छात्र को एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रोविजनल (अस्थायी) प्रवेश दिया जाए।
छात्र का भविष्य प्रशासनिक देरी की भेंट नहीं चढ़ सकता
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जायमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट कहा कि एक मेधावी छात्र का भविष्य नीतिगत प्रक्रियाओं या प्रशासनिक देरी के कारण प्रभावित नहीं होना चाहिए। सुनवाई के दौरान जब राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि निजी मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण नीति पर अभी विचार-विमर्श चल रहा है, तो मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “यदि निजी कॉलेज आरक्षण नीति का पालन नहीं करते, तो उन्हें बंद कर देना चाहिए। आरक्षण नीति की अनदेखी स्वीकार्य नहीं है।”
पैसे बचाने के लिए की ऑनलाइन पैरवी
अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी ने बताया कि जबलपुर से दिल्ली जाकर पैरवी करने में 3 से 4 हजार रुपये का खर्च आ रहा था। ऐसे में अथर्व ने ऑनलाइन माध्यम से ही अपना पक्ष रखने का निर्णय लिया। खास बात यह रही कि पिटीशन ड्राफ्ट करने से लेकर डायग्राम और ग्राफ तैयार करने तक का पूरा काम अथर्व ने स्वयं किया था। जब यह पिटीशन बेंच के सामने आई, तो जजों को मामला समझने में देर नहीं लगी।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता अथर्व चतुर्वेदी ने नीट परीक्षा दो बार उत्तीर्ण की थी, लेकिन निजी कॉलेजों में ईडब्ल्यूएस आरक्षण और फीस निर्धारण की स्पष्ट नीति न होने के कारण उन्हें प्रवेश नहीं मिल पा रहा था। अथर्व ने हाई कोर्ट में 2 जुलाई 2024 की राजपत्र अधिसूचना को चुनौती दी थी, जिसे उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(6) का उल्लंघन बताया था।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता को सत्र 2025-26 में उसकी ईडब्ल्यूएस रैंक के आधार पर एमबीबीएस में अस्थायी प्रवेश दिया जाए, बशर्ते वह निर्धारित शुल्क व अन्य औपचारिकताएं पूरी करे। हालांकि, अंतिम निर्णय आगे की सुनवाई और नीतिगत स्थिति पर निर्भर करेगा, लेकिन फिलहाल छात्र को बड़ी राहत मिली है।









