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ईरान को ट्रंप की ‘तबाही’ की धमकी का असर! पाकिस्तान की मध्यस्थता से 2 हफ्ते के युद्धविराम पर बनी सहमति, लेकिन सुलझने बाकी हैं ये 5 बड़े पेंच

अमेरिका ईरान युद्धविराम

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इस्लामाबाद/वॉशिंगटन (ओमदर्पण न्यूज़)।

अपनी निर्धारित समय सीमा से कुछ ही मिनट पहले और ईरान की “सभ्यता” को नष्ट करने की अभूतपूर्व धमकी के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि युद्ध को रोकने के लिए दो सप्ताह के युद्धविराम पर सहमति बन गई है। शनिवार से शुरू होने वाली इस बातचीत के लिए मध्यस्थ पाकिस्तान, इस्लामाबाद में अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधियों की मेजबानी कर रहा है। हालांकि, बातचीत की बुनियाद से लेकर कई अहम मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं।

ट्रंप ने ‘ट्रूथ सोशल’ पर दावा किया कि अमेरिका को ईरान से 10 सूत्रीय प्रस्ताव मिला है, जिसे उन्होंने बातचीत के लिए “एक व्यावहारिक आधार” बताया है। दूसरी ओर, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने अमेरिका के 15 सूत्रीय प्रस्ताव का जिक्र किया है। हालांकि, औपचारिक रूप से कोई प्रस्ताव पेश नहीं हुआ है, लेकिन मीडिया में लीक हुए ड्राफ्ट से पता चलता है कि दोनों पक्षों की उम्मीदों में भारी अंतर है।

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति के वरिष्ठ राजनयिक सलाहकार अनवर गर्गश ने बीबीसी को बताया कि ईरान, अमेरिका और पाकिस्तानी मध्यस्थ की ओर से विरोधाभासी बयान आ रहे हैं, जिससे स्थिति पूरी तरह साफ नहीं है।

इस पूरी बातचीत में मुख्य रूप से 5 बड़े पेंच फंसे हुए हैं:

1. ईरानी परमाणु कार्यक्रम:

अमेरिका लगातार ईरान पर परमाणु हथियार विकसित करने का आरोप लगाता रहा है, जिसे ईरान नकारता है। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के अनुसार, 12 दिनों के युद्ध में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को इतना नुकसान पहुंचा है कि उसे दोबारा खड़ा करने में लंबा वक्त लगेगा। हालांकि, 440 किलोग्राम अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम के भविष्य पर संदेह कायम है, जो इस्फ़हान परमाणु केंद्र के मलबे में दबा माना जा रहा है। ट्रंप की 15 सूत्रीय योजना में मांग है कि ईरान अपने परमाणु संयंत्र नष्ट करे और एनरिच्ड यूरेनियम देश से बाहर ले जाए। वहीं, ईरान शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए यूरेनियम संवर्धन के अधिकार पर अड़ा है।

2. ईरान की मिसाइलें और ड्रोन:

अमेरिका की शर्त है कि ईरान लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें न बनाए और मध्य पूर्व में अपने सहयोगियों को ड्रोन और सैन्य निर्यात बंद करे। अमेरिकी जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ जनरल डैन केन का दावा है कि युद्ध में ईरान की 80% मिसाइल फैसिलिटीज, 80% एयर डिफेंस सिस्टम और 90% हथियार कारखाने नष्ट हो चुके हैं। ऐसे में ईरान का रुख क्या होगा, यह देखना बाकी है।

3. होर्मुज़ स्ट्रेट (Strait of Hormuz):

दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण ईरान की बड़ी ताकत रही है। ईरान की योजना है कि वहां से गुजरने वाले प्रति जहाज से 20 लाख डॉलर तक का शुल्क (टोल) वसूला जाए, जिसे वह ओमान के साथ बांटेगा। यूएई के अनवर गर्गश ने इसे दुनिया के लिए एक ‘खतरनाक मिसाल’ और पूरी तरह से अस्वीकार्य बताया है। वहीं, ब्रिटेन ने इस मुद्दे पर 40 से अधिक देशों के साथ बैठक की है।

4. क्या लेबनान युद्धविराम समझौते का हिस्सा है?:

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और ईरान का मानना है कि लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्धविराम लागू होना चाहिए। लेकिन इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि यह युद्धविराम लेबनान पर लागू नहीं होता। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस मामले में इसराइल के रुख के करीब दिख रहे हैं। उन्होंने लेबनान के युद्ध को एक “अलग झड़प” बताया है।

5. ट्रंप के बयान और नेतृत्व शैली:

डोनाल्ड ट्रंप की अप्रत्याशित और ‘तबाही’ की धमकियों वाली “मैड मैन थ्योरी” की उनके समर्थक खूब प्रशंसा करते हैं। माना जा रहा है कि उनकी इसी आक्रामक शैली से फौरी तौर पर युद्धविराम संभव हो पाया है। लेकिन युद्ध के बदलते उद्देश्यों ने ट्रंप के अधिकार को लेकर सवाल भी खड़े किए हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि वह युद्ध शुरू करने में सक्षम हैं, लेकिन अब चुनौती यह है कि क्या उनमें इसे स्थायी रूप से समाप्त करने की क्षमता है।

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