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अबूझमाड़ में लौटी घोटुल की रौनक: मांदर की थाप पर फिर थिरके चेलिक-मोटियारिन

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  • खौफ के साये से बाहर आ रही बस्तर की संस्कृति

  • सुरक्षा के माहौल में झारावाही सहित कई गांवों में दोबारा सजने लगे पारंपरिक घोटुल

  • बुजुर्ग दे रहे युवाओं को संस्कृति और अनुशासन की शिक्षा

✍️ विशेष संवाददाता

नारायणपुर | बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले में स्थित अबूझमाड़ क्षेत्र की शाम अब भय के साये से मुक्त होने लगी है। जिस अंचल में कभी गोलियों की तड़तड़ाहट और सन्नाटे का खौफ पसरा रहता था, वहां अब सूर्य ढलते ही मांदर की थाप और ‘चेलिक-मोटियारिन’ के सुरीले लोकगीत गूंजने लगे हैं। सुरक्षा वातावरण में आए सकारात्मक बदलाव के साथ ही आदिवासी समाज की ऐतिहासिक धरोहर ‘घोटुल’ की रौनक फिर से लौट आई है। आदिवासी संस्कृति और अनुशासन का जीवंत केंद्र माना जाने वाला घोटुल अब अपनी पौराणिक लय में लौट रहा है।

झारावाही जैसे अंदरूनी गांवों में घोटुल का पुनरुद्धार

अबूझमाड़ के अंदरूनी गांवों, विशेषकर झारावाही में ग्रामीण अपनी प्राचीन संस्कृति को सहेजने के लिए सक्रिय हो गए हैं। स्थानीय लकड़ियों और प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग कर दोबारा पारंपरिक घोटुल तैयार किए जा रहे हैं। घोटुल परंपरा न केवल आदिवासी संस्कृति का हिस्सा है, बल्कि यह अनुशासन और सामाजिक शिक्षा का एक अनूठा केंद्र भी है। यहां बुजुर्गों द्वारा युवाओं को समाज के नियम, परंपराएं, संगीत, नृत्य और जीवनोपयोगी दायित्वों का पाठ पढ़ाया जा रहा है।

सामाजिक मूल्यों की महत्वपूर्ण जीवन-पाठशाला

घोटुल केवल एक सामाजिक केंद्र नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, लोककला और सामुदायिक मूल्यों की महत्वपूर्ण जीवन-पाठशाला है। नक्सली हिंसा और अनिश्चितता के दौर में गांव वाले शाम ढलते ही अपने घरों में दुबकने को मजबूर थे, जिससे घोटुल की गतिविधियां लगभग थम सी गई थीं। सुरक्षा बलों के प्रभावी अभियानों और नक्सल प्रभाव में आई कमी के बाद ग्रामीणों में सुरक्षा का भाव मजबूत हुआ है। अब युवा बेझिझक घोटुल पहुंच रहे हैं, जहां वे अपने बुजुर्गों से लोक परंपराएं, नृत्य और गीत सीखकर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

सांस्कृतिक अस्तित्व और आत्मसम्मान की वापसी

घोटुलों का पुनर्जीवन अबूझमाड़ के सांस्कृतिक अस्तित्व और आत्मसम्मान की वापसी का प्रतीक बन गया है। सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ होने से ग्रामीणों की आवाजाही, खेती-किसानी, हाट-बाजार और त्योहारों का उत्साह फिर से लौट आया है। ग्रामीणों का मानना है कि इस शांति को स्थायी बनाने के लिए अब शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क कनेक्टिविटी, रोजगार और संचार सुविधाओं का विस्तार अत्यंत आवश्यक है। घोटुलों से आती मांदर की थाप इस बात की गवाही दे रही है कि जब डर का अंधेरा छंटता है, तो परंपराएं और सामूहिक उल्लास अपने आप मुस्कुरा उठते हैं।

 

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