



प्रशासन की निष्क्रियता से आम जनता की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल……
जब जागरूक पत्रकारों को पुलिस गोल-गोल घुमा रही है….. तो क्या होता होगा….आम जनता का….
रायपुर।
राजधानी रायपुर में महिला पत्रकार निकिता राकेश जसवानी पर हुए निर्मम हमले ने पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता और कार्यशैली पर गंभीर और तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। यह हमला उस समय हुआ जब निकिता और उनके साथी पत्रकार बिलासपुर रोड स्थित एक यार्ड में अवैध लोहे की गतिविधियों का पर्दाफाश करने गए थे।
अवैध गतिविधियों का पर्दाफाश करते हुए बेरहमी से हमला – क्या कानून का कोई डर नहीं?
यह घटना यार्ड के मालिक लल्ली सरदार और उसके गुर्गों ने पत्रकारों पर बेरहमी से हमला किया। इस हमले में निकिता राकेश जसवानी और उनके साथी को गंभीर चोटें आईं। हमलावरों ने न केवल पत्रकारों को बेरहमी से पीटा, बल्कि उनके सबूत के तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे मोबाइल फोन भी छीन लिए। यह घटना कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाती नजर आती है। घटना के बाद निकिता और उनके साथी को तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता पड़ी।
पुलिस प्रशासन की लापरवाही पर उठते तीखे सवाल – क्यों नहीं मिली मदद?
हमले के बाद पीड़ित पत्रकारों ने थाने में शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें एक थाने से दूसरे थाने भेजा गया। सबसे पहले वे कबीर नगर थाने पहुंचे, जहां से उन्हें आमानाका थाने भेजा गया। आमानाका थाने में भी उनकी शिकायत दर्ज नहीं की गई और उन्हें उरला थाने भेज दिया गया। उरला थाने में पहुंचने पर यह कहा गया कि उनकी शिकायत में “पत्रकार” शब्द हटाने पर ही कार्रवाई की जाएगी। जब निकिता ने इस शर्त को मानने से इनकार किया, तो उनकी शिकायत दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया गया। यह लापरवाही नहीं, बल्कि पुलिस की साजिशपूर्ण निष्क्रियता है, जो अपराधियों को बचाने का प्रयास करती दिख रही है।
पुलिस प्रशासन की उदासीनता से पत्रकारिता पर सीधा हमला – क्या लोकतंत्र सुरक्षित है?
इस घटना ने न केवल पत्रकारिता के पेशे की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पुलिस प्रशासन की उदासीनता और अपराधियों के प्रति नरमी को भी उजागर किया है। यह हमला स्पष्ट रूप से पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है, जो लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता और लगातार टालमटोल ने यह साबित कर दिया है कि दोषियों को बचाने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। क्या इस तरह से हम लोकतंत्र और स्वतंत्र प्रेस की रक्षा कर पाएंगे?
पत्रकार संगठनों का आक्रोश – अब और नहीं सहेंगे अन्याय!
इस हमले के बाद विभिन्न पत्रकार संगठनों ने पुलिस की उदासीनता और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर अपनी कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने इस मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की है और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है। साथ ही, उन्होंने राज्य सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की है। यह घटना सिर्फ निकिता पर हमला नहीं, बल्कि हर उस आवाज पर हमला है जो सच्चाई को उजागर करने की कोशिश कर रही है।
सरकार से सख्त कदमों की मांग – दोषियों को कब मिलेगी सजा?
इस घटना के बाद राज्य सरकार से सख्त और तत्काल कार्रवाई की अपेक्षा की जा रही है। पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े कानून और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता है, ताकि अपराधियों को साफ संदेश दिया जा सके कि ऐसी हरकतें बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। पुलिस प्रशासन की कार्यशैली में सुधार करने और उसे जवाबदेह बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। दोषियों को जल्द से जल्द सजा दिलाने के लिए सरकार को निर्णायक कदम उठाने होंगे, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके और समाज में कानून और न्याय का भरोसा कायम रहे।





