29 सितम्बर 2026 |
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement

चतुर्थी श्राद्ध 2026: 30 सितंबर को तर्पण का शुभ मुहूर्त

शेयर करें

OM Darpan

Sep 30, 2026 03:33 am 652 views
चतुर्थी श्राद्ध 2026: 30 सितंबर को तर्पण का शुभ मुहूर्त

उदयतिथि और अपराह्न काल की गणना के आधार पर पूर्वजों के लिए होगा तर्पण और पिंडदान

वाराणसी। पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए चतुर्थी तिथि का श्राद्ध 30 सितंबर 2026, बुधवार को विधि-विधान से किया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2026 में चतुर्थी तिथि की शुरुआत 29 सितंबर की शाम 5:09 बजे से होगी, जो 30 सितंबर की दोपहर 2:55 बजे तक चलेगी। उदयातिथि और श्राद्ध के लिए अनिवार्य अपराह्न काल की उपलब्धता को देखते हुए ज्योतिषीय गणना के आधार पर बुधवार को ही श्राद्ध कर्म संपन्न करने का निर्णय लिया गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में जिस पूर्वज का निधन किसी भी माह की चतुर्थी तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध इसी दिन करने की परंपरा है। इसे लोकभाषा में 'चौथ का श्राद्ध' भी कहा जाता है। इस दिन परिवार के लोग अपनी सामर्थ्य और कुल परंपरा के अनुसार तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य के माध्यम से पितरों को श्रद्धा अर्पित करते हैं।

Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement

अपराह्न काल में श्राद्ध का रहेगा विशेष मुहूर्त

श्राद्ध कर्म में समय का विशेष महत्व बताया गया है। 30 सितंबर को कुतुप मुहूर्त सुबह 11:47 बजे से दोपहर 12:35 बजे तक रहेगा। इसके बाद रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:35 बजे से 1:22 बजे तक और सबसे महत्वपूर्ण अपराह्न काल दोपहर 1:22 बजे से 3:45 बजे तक रहेगा। शास्त्र सम्मत विधि के अनुसार, श्राद्ध कर्म के लिए अपराह्न काल को सबसे प्रधान और फलदायी समय माना जाता है।

कुश और काले तिल से तर्पण की विधि

चतुर्थी श्राद्ध की प्रक्रिया सुबह स्नान और घर की शुद्धि से प्रारंभ होती है। श्राद्धकर्ता पितरों का स्मरण कर संकल्प लेते हैं और हाथ में कुश धारण कर तर्पण की विधि पूर्ण करते हैं। जल में काले तिल, जौ और पुष्प मिलाकर पितरों के नाम एवं गोत्र का उच्चारण करते हुए अर्घ्य दिया जाता है। इसके पश्चात चावल, जौ और काले तिल के मिश्रण से बने पिंड अर्पित किए जाते हैं। इस अवसर पर सात्विक व्यंजनों का भोग तैयार कर पंचबलि की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें भोजन का अंश गाय, कौवे, कुत्ते और चींटियों को दिया जाता है। अंत में ब्राह्मण भोज कराकर यथाशक्ति दान-दक्षिणा दी जाती है।

आहार में संयम और सात्विकता का नियम

पितृ पक्ष की अवधि में आचरण और आहार की शुद्धता अनिवार्य मानी गई है। धार्मिक निर्देशों के अनुसार इस दौरान मांसाहार, नशीले पदार्थों और तामसिक भोजन जैसे प्याज-लहसुन से पूरी तरह दूरी बनानी चाहिए। श्राद्ध के दौरान गंगाजल और तुलसी के प्रयोग का विशेष महत्व है, जो तर्पण की प्रक्रिया को और अधिक पवित्र बनाता है। मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धापूर्वक किए गए इन कार्यों से पितृ तृप्त होते हैं और परिवार को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

शेयर करें

विज्ञापन / Advertisement

Government Advertisement
260930035856415

विज्ञापन

Advertisement