



रायपुर (कौशल संदुजा)।
छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्रों बस्तर और सरगुजा में ई-कुबेर से भुगतान की अनिवार्यता को अव्यावहारिक करार देते हुए प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि भाजपा सरकार द्वारा बिना सोचे समझे लागू किए गए इस तुगलकी फरमान से लाखों गरीब आदिवासी परिवार पाई-पाई के लिए मोहताज हो गए हैं। बस्तर और सरगुजा अंचल के कई गांव ऐसे हैं जहां 70-80 किलोमीटर दूर तक भी बैंक की शाखाएं नहीं हैं। बस्तर संभाग के सातों जिलों में सिर्फ जिला मुख्यालयों और कहीं-कहीं पर ब्लॉक मुख्यालयों में ही बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध हैं, और ब्लॉक मुख्यालय की बैंकिंग व्यवस्था का हाल भी खराब है। जहां बैंक हैं, वहां पर भी अक्सर नकदी की कमी होती है। बिजली की अनियमितता और इंटरनेट की अनुपलब्धता भी एक बड़ी समस्या है। ऐसे में जंगलों में रहने वाले आदिवासी मजदूरों के लिए भाजपा सरकार द्वारा थोपा गया ई-कुबेर सिस्टम बड़ी मुसीबत से कम नहीं है।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि प्रदेश के 27 विभागों में ई-कुबेर पोर्टल से भुगतान की जो व्यवस्था बनाई गई है उससे वन, लोक निर्माण और जल संसाधन विभाग के मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। बस्तर संभाग के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों की आजीविका का मुख्य साधन वनोपज और सरकारी विभागों द्वारा जंगलों में कराए जाने वाले विकास कार्यों में मजदूरी है। ई-कुबेर पोर्टल में कई ऐसी शिकायतें आई हैं जिनमें मजदूरों को भुगतान की सूचना तो मिलती है लेकिन वह राशि उन्हें प्राप्त नहीं होती। कई डिवीजन में करोड़ों रुपये का अता-पता नहीं है कि आखिर ई-कुबेर से भुगतान की गई राशि कहां गई।
सुरेंद्र वर्मा ने कहा है कि आदिवासी क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति, साक्षरता दर, और सांस्कृतिक परिवेश ऐसे सिस्टम के अनुकूल नहीं हैं। आदिवासी अंचल अभी भी बैंकिंग सुविधाओं से कोसों दूर है और ऐसे में मजदूरों को नगद भुगतान की सुविधा मिलनी चाहिए। ग्राम पंचायतों में भुगतान बंद होने से बस्तर के कई गांवों में आदिवासियों को अपनी मजदूरी के 100-200 रुपये निकालने के लिए भी 60-70 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है, जिसमें पूरा दिन बीत जाता है। बैंक में घंटों बैठने के बाद फॉर्म भरवाने के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके चलते कई आदिवासी सरकारी विभागों में काम करने से मना करने लगे हैं। इस समस्या से वन विभाग भी जूझ रहा है और मजदूरों की कमी के चलते ज्यादातर प्रोजेक्ट बंद हो रहे हैं। बीते छह महीनों में बस्तर में केवल पांच प्रतिशत ही विकास कार्य हो पाए हैं।
सुरेंद्र वर्मा ने यह भी कहा कि यह बेहद दुखद है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री और वन मंत्री, दोनों ही आदिवासी हैं। वन मंत्री स्वयं बस्तर का प्रतिनिधित्व करते हैं, फिर भी गरीब आदिवासियों के प्रति इतनी संवेदनहीनता क्यों? जो व्यवस्था लाखों आदिवासी परिवारों के आर्थिक हितों के खिलाफ है, उसे तत्काल खत्म किया जाना चाहिए।




