नई दिल्ली (ओमदर्पण न्यूज़)।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (18 मई 2026) को दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (DERC) में अध्यक्ष और सदस्यों की नियमित नियुक्ति के लिए चयन समिति के गठन की मांग वाली याचिका पर विचार करने का निर्णय लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग में नियमित नियुक्तियों की कमी को लेकर दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने गैर-सरकारी संगठन (NGO) ‘एनर्जी वॉचडॉग’ की ओर से दायर याचिका पर दिल्ली सरकार और DERC को यह नोटिस जारी किया। एनजीओ का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता प्रणव सचदेवा ने दलील दी कि एक निष्क्रिय DERC के कारण राष्ट्रीय राजधानी में बिजली और ऊर्जा से संबंधित मुद्दों के निवारण की मांग वाली याचिकाओं और आवेदनों का अंबार लग जाएगा।
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कानून के विपरीत है DERC की वर्तमान संरचना
याचिका में कहा गया है कि सरकार ने DERC में किसी न्यायिक सदस्य को शामिल करने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया है। याचिका के अनुसार, “DERC की वर्तमान संरचना पूरी तरह से कानून के विपरीत है क्योंकि इसमें केवल दो प्रोटेम (अस्थायी) सदस्य हैं; अध्यक्ष का पद खाली है; और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विपरीत, कानून का कोई जानकार व्यक्ति सदस्य के रूप में मौजूद नहीं है।”
अधिवक्ता प्रणव सचदेवा ने न्यायालय को बताया कि वर्तमान प्रोटेम सदस्य सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई एक अस्थायी व्यवस्था पर काम कर रहे हैं। ऐसे में आयोग में नियमित अध्यक्ष और सदस्यों की तत्काल नियुक्ति की आवश्यकता है।
स्वायत्तता की कमी और अधिकारों का उल्लंघन
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया कि वर्तमान स्थिति विद्युत अधिनियम के मूल आधार का भी उल्लंघन करती है, जिसके तहत राज्य विद्युत नियामक आयोगों को स्वायत्त और सरकारी हस्तक्षेप से स्वतंत्र होना चाहिए। नियमित और कार्यकाल वाली नियुक्तियां DERC के न्यायिक और नियामक, दोनों कार्यों के निर्वहन में निष्पक्षता और स्वायत्तता सुनिश्चित करती हैं।
याचिका में ‘बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि “स्वायत्तता की कमी DERC के तहत व्यापक नियामक विफलता का प्रमुख कारण रही है।”
याचिका के अनुसार, आयोग में न्यायिक सदस्य का न होना DERC को उसके न्यायिक कार्यों को पूरा करने में पूरी तरह से अक्षम बनाता है, जो शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के बुनियादी सिद्धांतों को नष्ट करता है। यह भी कहा गया कि विद्युत अधिनियम की धारा 142 के तहत याचिकाओं और आवेदनों पर अब सुनवाई नहीं हो रही है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत उपभोक्ताओं के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।









