सुकमा।
छत्तीसगढ़ के धुर नक्सल प्रभावित और दुर्गम इलाकों में भी अब ‘बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़’ अभियान का असर दिखने लगा है। सुकमा जिले में प्रशासन की एक टीम ने जान जोखिम में डालकर, उफनते नदी-नालों को पार कर एक 12 वर्षीय बच्ची को बाल विवाह के बंधन में बंधने से बचा लिया। यह मामला सुकमा विकासखंड के ग्राम पंचायत रामाराम के सुदूर गांव नाड़ीगुफा का है।
सूचना मिलते ही हरकत में आया अमला
जानकारी के अनुसार, 2 जनवरी 2026 को प्रशासन को सूचना मिली थी कि नाड़ीगुफा में एक नाबालिग बालिका का विवाह कराया जा रहा है। गांव की भौगोलिक स्थिति बेहद कठिन है, लेकिन खबर की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर के मार्गदर्शन में तुरंत एक संयुक्त टीम गठित की गई। इस टीम में महिला एवं बाल विकास विभाग, जिला बाल संरक्षण इकाई और चाइल्ड लाइन के सदस्य शामिल थे।
पैदल मार्च और समझाइश
टीम जब मौके के लिए निकली तो रास्ते में उफनते नदी-नाले और दुर्गम रास्ते बाधा बने, लेकिन अधिकारियों ने पैदल यात्रा कर गांव तक पहुंच बनाई। वहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शादी की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी के नेतृत्व में टीम ने परिजनों और ग्रामीणों को बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम-2006 के तहत कानूनी कार्रवाई और इसके गंभीर परिणामों के बारे में समझाया।
प्रशासन की संवेदनशीलता और समझाइश का असर यह हुआ कि परिजनों ने स्वेच्छा से शादी रोकने का फैसला लिया। मौके पर पंचनामा तैयार कर कार्रवाई पूरी की गई और बच्ची को दोबारा पढ़ाई से जोड़ने की पहल शुरू कर दी गई है।
अभियान का असर: अब तक 189 बाल विवाह रुके
उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने 10 मार्च 2024 को इस अभियान की शुरुआत की थी। नवंबर 2025 तक प्रदेश में 189 बाल विवाह रोके जा चुके हैं। बालोद जिला पहले ही पूर्णतः बाल विवाह मुक्त घोषित हो चुका है। राज्य सरकार का लक्ष्य है कि 31 मार्च 2026 तक 50% पंचायतों को बाल विवाह मुक्त घोषित किया जाए और 31 मार्च 2029 तक पूरे छत्तीसगढ़ को इस कुप्रथा से आजादी मिले।
महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने स्पष्ट किया है कि बच्चों का सुरक्षित और शिक्षित भविष्य राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।










