इराक की 6 साल की बच्ची रईमास अली करीम, जो जन्मजात विकृति से जूझ रही थी, के पिता ने उसकी इलाज के लिए भारत के मुंबई आने का साहसिक फैसला किया। इराक में युद्ध और अस्थिरता के कारण वहां इलाज की कोई संभावना नहीं थी। बच्ची के चेहरे के बाएं हिस्से में एक दुर्लभ जन्मजात विकृति थी, जिसके कारण संक्रमण और खून बहने की समस्या थी। इन कठिनाइयों के बावजूद, पिता ने हर चुनौती का सामना करते हुए अपनी बेटी को एक नई जिंदगी देने का निर्णय लिया।
मुंबई में पहला सर्जिकल चरण
जुलाई 2019 में, मुंबई के प्लास्टिक सर्जन डॉ. निलेश सतभाई ने रईमास का पहला सर्जिकल चरण प्रारंभ किया। हालांकि, कोविड-19 महामारी और इराक में युद्ध की परिस्थितियों के कारण सर्जरी का अंतिम चरण समय पर नहीं हो सका। इसके बावजूद, डॉक्टरों की टीम ने बच्ची को राहत देने के लिए हर संभव प्रयास किया और सर्जरी के अगले चरण की योजना बनाई।
दूसरी बार भारत लौटने का संघर्ष
कोविड-19 और इराक की अस्थिर परिस्थितियों के बीच, रईमास के पिता ने मई 2024 में अपनी बेटी को पुनः इलाज के लिए भारत लाने का फैसला किया। मुंबई पहुंचने के बाद, डॉ. सतभाई और उनकी टीम ने 30 मई 2024 को सर्जरी का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा किया। इस सर्जरी में क्रॉस-फेशियल नर्व ग्राफ्टिंग की प्रक्रिया की गई, जिससे चेहरे की नसों को फिर से कार्यशील बनाया गया।
सर्जरी के बाद रईमास की स्थिति में काफी सुधार हुआ, और उसे तीन दिन बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। डॉ. सतभाई ने बताया कि अगले 8 से 10 महीनों के दौरान नसों की रिकवरी की जाएगी, जिसके बाद अप्रैल 2025 में सर्जरी के दूसरे चरण में बच्ची के पैर से मांसपेशियों का ट्रांसप्लांट किया जाएगा। यह ट्रांसप्लांट चेहरे की मूवमेंट और समरूपता को पूरी तरह बहाल करने में मदद करेगा।
पिता की भावनाएँ और आशा
अपनी बेटी के सफल इलाज के बाद, रईमास के पिता ने डॉक्टरों और पूरी मेडिकल टीम का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “अपनी बेटी की तकलीफ देखकर मैं बेहद डर गया था। इराक में युद्ध के कारण घर से बाहर निकलना खतरनाक था, लेकिन बेटी का इलाज करवाना भी जरूरी था। डॉ. सतभाई और उनकी टीम की बदौलत अब मेरी बेटी मुस्करा सकती है, खा सकती है और बोल सकती है। मुझे उम्मीद है कि जैसे मेरी बेटी की हालत सुधरी है, वैसे ही हमारे देश का संघर्ष भी खत्म हो जाएगा।”






