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वैवाहिक विवाद या प्रताड़ना का आरोप ही काफी नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने बताया कब माना जाएगा आत्महत्या के लिए उकसाना

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  • शीर्ष अदालत ने हिमाचल हाई कोर्ट के फैसले को पलटा, कहा- आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए ठोस आचरण का प्रमाण जरूरी

✍️ विशेष संवाददाता

नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल प्रताड़ना के आरोप या रोजमर्रा के वैवाहिक विवाद के आधार पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी दहेज प्रताड़ना से जुड़े वर्षों पुराने एक मामले में संजय कुमार को बरी करते हुए की है। न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने 3 सितंबर को यह फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि पति-पत्नी के वैवाहिक जीवन में अनबन होना संभव है, लेकिन धारा 107 के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 306 के प्रावधान लागू करने के लिए केवल इतना पर्याप्त नहीं है।

उकसाने का नहीं मिला कोई प्रमाण, पति ने खुद पहुंचाया था अस्पताल

अदालत ने मामले की समीक्षा के दौरान पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि अपीलकर्ता संजय कुमार ने अपनी पत्नी लता को आत्महत्या के लिए उकसाने का कोई कृत्य किया था। इसके विपरीत, साक्ष्यों से पता चला कि जैसे ही संजय कुमार को जानकारी मिली कि उसकी पत्नी ने दवा समझकर कोई जहरीला तरल पदार्थ पी लिया है, उसने तत्काल चिकित्सकीय सहायता मांगी और उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया। पीठ ने कहा कि मामले में उपलब्ध सभी साक्ष्यों पर विचार करने के बाद सत्र न्यायालय का यह निष्कर्ष सही था कि अभियोजन पक्ष आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

हाई कोर्ट की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने संजय कुमार को बरी करने के सत्र न्यायालय के फैसले को पलटकर गलती की। शीर्ष अदालत के अनुसार, उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए कारणों की पर्याप्त और विस्तृत समीक्षा नहीं की थी। हाई कोर्ट ने अपनी संक्षिप्त टिप्पणी में यह मान लिया था कि आरोपी ने पीड़िता को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया था और उसे उसकी मां व बहनों के सामने घसीटा था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसे आरोपों के समर्थन में कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है और संबंधित गवाहों ने जिरह में स्वीकार किया कि उन्होंने पुलिस को दिए पहले के बयानों में ऐसी किसी घटना का उल्लेख नहीं किया था।

दहेज और क्रूरता के आरोपों में नहीं मिला दम

सत्र न्यायालय ने पहले ही पाया था कि पैसे मांगने या पीड़िता को कर्ज लेने के लिए कहने के आरोप बाद में लगाए गए प्रतीत होते हैं। वहां ऐसा कोई गवाह भी नहीं मिला जिसने पीड़िता को किसी गंभीर परिणाम की धमकी दिए जाने की बात कही हो। सुप्रीम कोर्ट ने उल्लेख किया कि केवल प्रताड़ना के आरोप को अपने आप में क्रूरता नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब आरोपी ने गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के बाद भी पीड़िता के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार किया था। पीड़िता की बहनों ने भी अपने बयानों में बताया था कि ससुराल में उनका स्वागत अच्छे तरीके से किया जाता था।

क्या था पूरा मामला

यह मामला जनवरी 2008 में संजय कुमार और लता के विवाह से शुरू हुआ था। वर्ष 2009 में उनकी एक बेटी हुई, लेकिन बाद में जहरीला पदार्थ खाने से लता की मौत हो गई। जून 2010 में सत्र न्यायालय ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। हालांकि, हिमाचल प्रदेश सरकार ने इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसने 2016 में संजय कुमार को दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए आरोपी के किसी ठोस कृत्य या आचरण का प्रमाण देना अनिवार्य है।

 

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