संभल।
उत्तर प्रदेश के संभल स्थित मुगलकालीन शाही जामा मस्जिद में रविवार को अदालत के आदेश पर किए जा रहे सर्वेक्षण के दौरान भड़की हिंसा बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि इस संवेदनशील इलाके में सर्वेक्षण के दौरान पुलिस प्रशासन की तैयारियां उस स्तर की नहीं थीं, जैसी होनी चाहिए थीं।
स्थानीय अदालत में दायर याचिका में यह दावा किया गया था कि जिस स्थान पर मस्जिद स्थित है, वहां पहले एक मंदिर था। अदालत के आदेश से ही सर्वे टीम मस्जिद पहुंची थी। हालांकि, यह भी गौरतलब है कि कुछ दिन पहले यहां एक प्रारंभिक सर्वेक्षण किया गया था, तब भी तनाव के संकेत मिल चुके थे। इसके बावजूद, यदि इस व्यापक सर्वेक्षण के दौरान एहतियाती उपाय नहीं किए गए तो यह पुलिस प्रशासन की गलती मानी जाएगी।
सर्वे के दौरान जब विरोध हुआ, तब हथियारबंद उपद्रवियों ने पहले सीसीटीवी कैमरों को तोड़ दिया ताकि उनकी पहचान न हो सके। इस घटना से यह साफ नजर आता है कि हिंसा की तैयारी पहले से ही की गई थी। लेकिन, स्थानीय खुफिया विभाग को इसकी भनक तक नहीं लग सकी, जिससे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होते हैं। इससे पहले भी कई राज्यों में ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जब प्रशासन द्वारा की जा रही कानूनी कार्रवाई में हस्तक्षेप करने की कोशिश की गई और हिंसक घटनाएं हुईं।
संभल प्रशासन ने इन घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया। यह पूरी घटना इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि अगर उपद्रवी तत्व इस तरह की सुनियोजित हिंसा को अंजाम दे सकते हैं, तो वे इसे सामाजिक सद्भाव को नष्ट करने की कोशिश में भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इस प्रकार की घटनाएं सामाजिक और सांस्कृतिक एकता के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं।
विपक्षी दल भले ही इस घटना का दोष किसी पर भी मढ़ें, लेकिन यह तथ्य है कि अदालत के आदेश पर ही सर्वे टीम वहां पहुंची थी, जो एक नियमित विधिसम्मत प्रक्रिया थी। 1991 का पूजा स्थल अधिनियम भी ऐसी जगहों के सर्वेक्षण की अनुमति देता है। यदि किसी समुदाय को इसे अपने अधिकारों में हस्तक्षेप लगता है, तो उसके लिए कानूनी रास्ते खुले हैं, क्योंकि संविधान हर नागरिक को समानता, सम्मान और सुरक्षा का अधिकार देता है। लेकिन पत्थरबाजी का अधिकार किसी को नहीं है। दोषियों को सजा मिलनी चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि असामाजिक तत्व इस घटना का इस्तेमाल सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करने के लिए न कर सकें।







