शाम का समय, घर का बरामदा और मन में उठते असंख्य सवाल… मनीषा अकेली बैठी थी, जब उसकी नजर सामने से गुजर रही खेत में काम कर लौटी मजदूर महिलाओं पर पड़ी। वे थकान के बावजूद हंसी-खुशी से गीत गाते हुए जा रही थीं। उनके सिर पर खाने के खाली डब्बे, टोकनियाँ और फावड़ा थे, लेकिन उनके चेहरे पर संतोष और आनंद झलक रहा था।

मनीषा को एहसास हुआ कि वह इन महिलाओं से कई गुना अधिक समृद्ध है—आरामदायक जीवन, घर, परिवार, सब कुछ होते हुए भी क्यों वह उदास रहती है?
आत्ममंथन: क्या समृद्धि ही खुशी की कुंजी है?
करीब छह महीने पहले मनीषा के पति, जो कॉलेज में प्रोफेसर थे, निलंबित हो गए थे। कारण? कॉलेज में एक सरकारी मंत्री का अपमान। हालांकि एक साल बाद उन पर लगे सभी आरोप हटा दिए गए और निलंबन रद्द कर दिया गया, वेतन भी मिल गया। फिर भी, मनीषा के मन में असंतोष और दुख बना रहा।
उसने खुद से सवाल किया—“क्या मैं खुश नहीं रह सकती?”
खुशी का असली राज़ क्या है?
👉 संपन्नता खुशी की गारंटी नहीं होती: मेहनतकश मजदूर महिलाएँ कठिन परिश्रम के बावजूद खुश थीं, जबकि मनीषा, जिसे जीवन में कोई बड़ी समस्या नहीं थी, उदास थी।
👉 संतोष ही सच्ची खुशी है: जिनके पास कम है, वे भी खुश रह सकते हैं, अगर वे जीवन को स्वीकार कर उसे आनंद के साथ जीएं।
👉 हमारी सोच ही दुख या सुख का कारण बनती है: तुलना करने से हम दुखी हो सकते हैं, लेकिन कृतज्ञता से खुशी पा सकते हैं।
निष्कर्ष: खुशी ढूंढनी नहीं, महसूस करनी पड़ती है
मनीषा को आखिरकार एहसास हुआ कि खुशी बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि हमारे नजरिए में होती है। जीवन में जो कुछ भी है, अगर उसे स्वीकार कर संतोष से जिया जाए, तो सच्ची खुशी पाई जा सकती है।
छत्तीसगढ़ रत्न डॉक्टर शिरोमणि माथुर






