Search
Close this search box.
Search
Close this search box.

ताड़ के पत्तों में दबे थे सदियों पुराने इलाज के राज: केरल में 5 दुर्लभ आयुर्वेदिक पांडुलिपियों का हुआ सनसनीखेज खुलासा!

Ayurvedic Manuscripts Transcription

👇खबर सुनने के लिए प्ले बटन दबाएं

Ayurvedic Manuscripts Transcription

  • आयुर्वेद की ‘ग्रंथा’ और ‘वट्टेझुथु’ लिपियों का डिकोड: 33 विशेषज्ञों ने 15 दिनों में तैयार किया दुर्लभ ज्ञान का खजाना

त्रिशूर (केरल)।

भारत की शास्त्रीय चिकित्सा विरासत को सहेजने की दिशा में एक बड़ी सफलता मिली है। आयुष मंत्रालय के तहत केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (सीएसयू) ने केरल के त्रिशूर स्थित पुरनट्टुकरा परिसर में आयुर्वेदिक पांडुलिपियों पर 15 दिवसीय लिप्यंतरण क्षमता निर्माण कार्यशाला का सफल समापन किया। 12 से 25 जनवरी 2026 तक चले इस आवासीय कार्यक्रम में आयुर्वेद के 18 और संस्कृत के 15 विशेषज्ञों सहित कुल 33 अध्येताओं ने दुर्लभ पांडुलिपियों को आधुनिक अनुसंधान के लिए सुलभ बनाया।

5 दुर्लभ पांडुलिपियों का लिप्यंतरण

इस कार्यशाला का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम आयुर्वेद की पांच अप्रकाशित और दुर्लभ पांडुलिपियों का लिप्यंतरण रहा। इनमें शामिल हैं:

  1. धन्वंतरि (वैद्य) चिंतामणि: 146 ताड़ के पत्तों पर ग्रंथा लिपि में लिखी इस पांडुलिपि का संस्कृत में अनुवाद किया गया।

  2. द्रव्यशुद्धि: 110 पृष्ठों की ग्रंथा पांडुलिपि, जिसका अब संस्कृत में अध्ययन किया जा सकेगा।

  3. वैद्यम: 59 पृष्ठों की मध्यकालीन मलयालम पांडुलिपि का मलयालम में लिप्यंतरण।

  4. रोग निर्णय (भाग-I): 75 पृष्ठों की मध्यकालीन मलयालम पांडुलिपि का आधुनिक मलयालम में रूपांतरण।

  5. विविधारोगंगल: 78 ताड़ के पत्तों पर वट्टेझुथु लिपि में लिखी पांडुलिपि, जिसका मलयालम और संस्कृत दोनों में लिप्यंतरण किया गया।

विशेषज्ञों का अंतःविषय दृष्टिकोण कार्यशाला में ग्रंथा, मध्यकालीन मलयालम और वट्टेझुथु जैसी कठिन लिपियों पर प्रशिक्षण दिया गया। सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रोफेसर वैद्य रबीनारायण आचार्य ने बताया कि ओडिशा के पुरी के बाद यह दूसरा सफल प्रयास है, जहां साक्ष्य-आधारित आयुर्वेद को मजबूत करने के लिए प्राचीन ज्ञान को डिकोड किया गया।

सीएसयू गुरुवायूर परिसर के निदेशक प्रोफेसर के.के. शाइन और प्रोफेसर के. विश्वनाथन ने मलयालम आयुर्वेदिक पांडुलिपियों के व्यवस्थित संरक्षण की प्रतिबद्धता दोहराई। इस पूरे कार्यक्रम का समन्वय प्रोफेसर के. विश्वनाथन और सीसीआरएएस की डॉ. पार्वती जी. नायर ने किया। समापन सत्र में एनएआरआईपी के प्रभारी डॉ. वी सी दीप भी उपस्थित रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से न केवल क्षेत्रीय चिकित्सा परंपराएं सुरक्षित होंगी, बल्कि आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलेगी।

omdarpanprmot-01
previous arrow
next arrow